होली पर समय से सैलरी जारी करने के आदेश के बीच इनके वेतन पर असमंजस; फंसा है ये पेच
नए अधिनियम में कार्यवाहक प्रधानाचार्य को स्वतः प्रधानाचार्य का बढ़ा हुआ वेतन देने का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि पहले से दिए गए वेतन की वसूली नहीं की जाएगी, लेकिन आदेश की तारीख के बाद भुगतान नियमों के अनुसार ही होगा। इसी आदेश के बाद DIOS कार्यालय ने सभी संबंधित विद्यालयों से अभिलेख मांगे हैं।

UP News: यूपी में होली पर राज्य कर्मचारियों, शिक्षकों को सैलरी और संविदा कर्मचारियों को मानदेय का भुगतान त्योहार से पहले शनिवार को ही कर देने का आदेश है। लेकिन वेतन समय से जारी करने के इस शासनादेश के बीच गोरखपुर के 27 कार्यवाहक प्रधानाचार्यों के वेतन को लेकर पेच फंसा है और असमंजस की स्थिति बनी हुई है। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया आदेश से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि तदर्थ और कार्यवाहक प्रधानाचार्य को नियमित प्रधानाचार्य के बराबर वेतन तभी मिलेगा, जब 1982 के अधिनियम की धारा 18 में दी गई सभी शर्तें पूरी हों।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नए अधिनियम (2023) में कार्यवाहक प्रधानाचार्य को स्वतः प्रधानाचार्य का बढ़ा हुआ वेतन देने का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि पहले से दिए गए वेतन की वसूली नहीं की जाएगी, लेकिन आदेश की तिथि के बाद भुगतान नियमों के अनुसार ही होगा। इसी आदेश के बाद जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) कार्यालय ने सभी संबंधित विद्यालयों से अभिलेख मांगे हैं और विस्तृत जांच शुरू कर दी है। जिन कार्यवाहक प्रधानाचार्यों की अधियाचना, रिक्ति की सूचना या नियुक्ति संबंधी दस्तावेज पूरे नहीं मिलेंगे, उन्हें फिर से मूल वेतन पर लाया जा सकता है। इससे उनकी मासिक आय पर सीधा असर पड़ेगा। जिनकी सेवानिवृत्ति निकट है, उनकी पेंशन पर प्रभाव पड़ सकता है।
तीन श्रेणी में देखा जा रहा मामला
इस मामले को तीन श्रेणियों में देखा जा रहा है। पहली श्रेणी के अनुसार 2023 में नया आयोग लागू होने के बाद कार्यवाहक प्रधानाचार्य को स्वतः प्रधानाचार्य के बराबर वेतन देने का स्पष्ट प्रावधान नहीं रहा। दूसरी श्रेणी में वे हैं, जब 2023 से पहले अधियाचना और पत्राचार की प्रक्रिया ऑनलाइन हो चुकी थी, इसलिए उस अवधि में बने कार्यवाहक प्रधानाचार्यों के रिकॉर्ड विभाग के पास उपलब्ध मिल रहे हैं।
तीसरी श्रेणी सबसे संवेदनशील मानी जा रही है। समस्या सबसे ज्यादा 2013 से पहले के मामलों में सामने आ रही है। उस समय पूरी प्रक्रिया ऑफलाइन होती थी, इसलिए कई अभिलेख अब आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। उस दौर में वरिष्ठ शिक्षकों को कार्यवाहक प्रधानाचार्य के रूप में तदर्थ पदोन्नति दी गई थी, लेकिन अब यह जांच हो रही है कि उस समय रिक्ति की अधियाचना विधिवत भेजी गई थी या नहीं, और सभी शर्त पूरी हुई थी या नहीं। विभागीय सूत्रों के अनुसार वर्ष 2003 से 2005 के बीच हुई नियुक्तियों में सबसे अधिक दिक्कत आ रही है। कई मामलों में फाइलें अधूरी हैं या उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं, जिससे वेतन निर्धारण को लेकर संशय बना हुआ है।




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