allahabad highcourt says live in relationship not illegal interfaith couples security order लिव-इन किसी भी कानून में प्रतिबंधित या दंडनीय अपराध नहीं, हाईकोर्ट ने कहा- सुरक्षा आवश्यक, Uttar-pradesh Hindi News - Hindustan
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लिव-इन किसी भी कानून में प्रतिबंधित या दंडनीय अपराध नहीं, हाईकोर्ट ने कहा- सुरक्षा आवश्यक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अंतर्धार्मिक जोड़ों की सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए स्पष्ट किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप किसी भी कानून के तहत प्रतिबंधित या दंडनीय अपराध नहीं है।

Tue, 31 March 2026 06:06 AMYogesh Yadav प्रयागराज, विधि संवाददाता
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लिव-इन किसी भी कानून में प्रतिबंधित या दंडनीय अपराध नहीं, हाईकोर्ट ने कहा- सुरक्षा आवश्यक

UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के मूल अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए कहा है कि अंतर्धार्मिक जोड़े की सुरक्षा आवश्यक है। कोर्ट ने लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और शाफिन जहां बनाम अशोकन केएम मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कड़े शब्दों में कहा कि जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव करना संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है। लिव-इन रिलेशनशिप किसी भी कानून के तहत प्रतिबंधित या दंडनीय अपराध नहीं है। इसके कोर्ट ने टिप्पणी की कि उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 भी अंतर्धार्मिक संबंधों या विवाह पर तब तक रोक नहीं लगाता, जब तक उसमें जबरन धर्मांतरण जैसा कोई तत्व शामिल न हो।

कोर्ट ने कहा कि दो वयस्क व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रहने का निर्णय लेते हैं, तो उनके निजी जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार न तो परिवार, न समाज और न ही राज्य को है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के साथी के साथ रहने और गरिमापूर्ण जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। जिसमें व्यवधान नहीं उत्पन्न किया जा सकता।

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यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने काजल प्रजापति व अन्य की याचिका पर दिया है। मामले के तथ्यों के अनुसार याची अंतर्धार्मिक लिव-इन रिलेशनशिप में हैं और उन्होंने परिवार वालों से अपनी जान का खतरा बताते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई है। पुलिस प्रशासन ने उनकी शिकायत पर ध्यान नहीं दिया तो उन्होंने उच्च न्यायालय की शरण ली।

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कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचियों को किसी भी प्रकार की क्षति पहुंचती है तो वे तत्काल सुरक्षा प्रदान करें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति उनकी इच्छा के विरुद्ध या धोखे से धर्म परिवर्तन का प्रयास करता है तो याची उसके खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि यह आदेश किसी कानूनी जांच या कार्यवाही में बाधा नहीं बनेगा और न ही याचियों की आयु के संबंध में अंतिम निर्णय माना जाएगा।

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