निजी जगहों पर धार्मिक कार्यक्रमों पर कोई रोक नहीं, संभल में नमाज पर हाईकोर्ट ने साफ की स्थिति
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल में नमाजियों की संख्या सीमित करने के मामले में स्पष्ट किया है कि निजी स्थानों पर धार्मिक कार्यक्रमों या प्रार्थनाओं पर कोई रोक नहीं लगाई जा सकती। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने कहा कि हर नागरिक को पूजा के लिए एकत्र होने का अधिकार देता है।

Sambhal News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल में नमाजियों की संख्या सीमित करने के मामले में दाखिल याचिका का निस्तारण करते हुए संभल जिला प्रशासन को सुरक्षित और शांति पूर्ण वातावरण में नमाज़ कराने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 देश में हर धार्मिक संप्रदाय को पूजा के लिए एकत्र होने के अधिकार की रक्षा करता है, लेकिन यह प्रार्थना की आड़ में एक धर्म द्वारा दूसरे धर्म को उकसाने को कोई सुरक्षा नहीं देता। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया कि किसी व्यक्ति की निजी जगह पर की जाने वाली प्रार्थनाओं या धार्मिक कार्यक्रमों को लेकर कोई रुकावट या रोक नहीं हो सकती, चाहे वह किसी भी धर्म या संप्रदाय का हो। ये टिप्पणियां जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने मुनाजिर खान याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं।
याचिका में आरोप लगाया गया कि संभल प्रशासन ने याची को उस जगह पर नमाज़ पढ़ने से रोक रहा था, जहां याची का का दावा कि एक मस्जिद मौजूद है। याची का कहना था कि रमज़ान के दौरान बड़ी संख्या में लोग आकर प्रार्थना करना चाहते हैं और एक ही समय पर पूजा करने वालों की संख्या पर कोई पाबंदी नहीं हो सकती। 27 फरवरी को इस मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने प्रशासन का वह फैसला खारिज कर दिया था, जिसमें रमज़ान के दौरान नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित की गई।
कोर्ट ने कहा था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की ज़िम्मेदारी है। बेंच ने यह भी टिप्पणी की कि अगर पुलिस अधीक्षक और ज़िला कलेक्टर को कानून-व्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा है, इसलिए वे पूजा करने वालों की संख्या सीमित करना चाहते हैं तो उन्हें या तो इस्तीफ़ा दे देना चाहिए या अपना तबादला करवा लेना चाहिए, अगर वे कानून का राज लागू करने में असमर्थ हैं।
16 मार्च को जब यह मामला फिर से सामने आया तो अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने कहा कि 27 फरवरी के आदेश में 20 उपासकों की पाबंदी का ज़िक्र याचिकाकर्ता के वकील की गलतबयानी की वजह से आ गया, और राज्य ने असल में कभी ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाई।




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