गंभीर अपराधों में निजी समझौता कर नहीं बच सकते, हत्या के प्रयास की FIR रद्द करने से हाईकोर्ट का इनकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि गंभीर अपराधों में निजी समझौता एफआईआर (FIR) रद्द करने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की कि जानलेवा हथियारों से हमले के बाद समझौते को स्वीकार करना न्याय प्रणाली को ध्वस्त करना होगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि गंभीर और जघन्य अपराधों में आपसी समझौता न्याय प्रक्रिया को रोकने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि जघन्य अपराधों को अंजाम देने के बाद निजी तौर पर समझौता करके न्याय के रास्ते में बाधा डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक न्याय प्रणाली कोई निजी कार्य नहीं है।
यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने मेरठ के खरखौदा थाने में दर्ज एफआईआर को लेकर दाखिल मनोज व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा कि जानलेवा हथियारों के साथ हुए दोतरफा हमले में दोनों पक्षों को गंभीर छोटे आईं, ऐसे मामलों में समझौते को आम बात मान लिया जाए तो पब्लिक जस्टिस सिस्टम खत्म हो जाएगा। कोर्ट ने कहा कि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने, गंभीर अपराध करने और फिर समझौते का रास्ता अपनाकर न्याय की राह को भटकाने का अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि पब्लिक जस्टिस सिस्टम जनता को न्याय दिलाने के लिए तैयार किया गया है। लोगों को समझना चाहिए कि न्याय देना कोई निजी कार्य नहीं है। इसी के साथ कोर्ट ने दोनों पक्षों में समझौते के आधार पर दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग में दाखिल याचिका खारिज कर दी और याची को पुलिस की रिपोर्ट पर प्रोटेस्ट करने को कहा है। कोर्ट ने कहा हड्डी तक गहरा कटा घाव है। जान भी जा सकती थी। ऐसा करने वाले अब कह रहे हैं कि समझौता हो गया है इसलिए केस कार्यवाही समाप्त की जाए।
कोर्ट ने कहा सुप्रीम कोर्ट ने जानलेवा हमले के कुछ मामलों को समझौते के आधार पर रद्द करने का समर्थन किया है लेकिन ऐसे समझौते सभी तरह के मामलों में सही नहीं हैं। इस मामले में आरोप हत्या के प्रयास का है। हमले की प्रकृति व लगी चोटों पर निर्भर करेगा, हमले में प्रयुक्त हथियार पर भी विचार करना होगा।
याचिका में मेरठ के खरखौदा थाने में दिसंबर 2025 में दर्ज एक प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की गई थी। इस घटना में दोनों पक्षों की ओर से क्रॉस एफआईआर दर्ज कराई गई थीं। एक पक्ष के प्रदीप को सिर पर गंभीर चोटें आईं, जिसमें एक घाव हड्डी तक गहरा था। याचियों के पक्ष से बबलू, गजेंद्र और जॉनी को भी गंभीर चोटें आईं। बबलू के सिर पर भी हड्डी तक गहरा घाव पाया गया। हमले में लाठी-डंडों के अलावा बलकटी, लोहे की छड़ें, फरसा और चाकू जैसे घातक हथियारों का इस्तेमाल किया गया था।
कोर्ट में दलील दी गई कि दोनों पक्षों ने आपस में समझौता कर लिया है इसलिए एफआईआर रद्द कर दी जानी चाहिए। कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया और सख्त लहजे में कहा कि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने और जघन्य अपराध करने के बाद समझौते के माध्यम से न्याय की दिशा मोड़ने का अधिकार नहीं है। ऐसे मामलों में समझौते को नियमित तौर पर स्वीकार किया जाने लगा तो सार्वजनिक न्याय प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।




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