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पति के रिश्तेदारों पर सिर्फ आरोप लगाना दहेज उत्पीड़न का पर्याप्त आधार नहीं: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वैवाहिक विवादों में पति के रिश्तेदारों पर केवल सामान्य आरोप लगाना दहेज उत्पीड़न (धारा 498ए) के तहत कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

Fri, 15 May 2026 09:35 PMYogesh Yadav प्रयागराज, विधि संवाददाता
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पति के रिश्तेदारों पर सिर्फ आरोप लगाना दहेज उत्पीड़न का पर्याप्त आधार नहीं: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पति के रिश्तेदारों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवाद में सिर्फ नाम शामिल होने से किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता, जब तक सक्रिय भूमिका के ठोस सबूत न हों। यह मामला हाथरस के ससनी कोतवाली क्षेत्र का है। पीड़िता नीतेश शर्मा ने 2020 में अपने पति अमित कुमार शर्मा, सास-ससुर, देवर और ननद के खिलाफ केस दर्ज कराया था। आरोप था कि 24 जुलाई 2007 को हुई शादी में दहेज देने के बावजूद, आरोपी 5 लाख रुपये और कार की मांग को लेकर लगातार मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न कर रहे थे। एफआईआर में मारपीट, गला दबाने की कोशिश और तांत्रिक प्रथाओं के बहाने अश्लील हरकतों जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे।

मामले की सुनवाई के दौरान हाथरस के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 26 मई 2023 को और अपर सत्र न्यायाधीश ने 29 सितंबर 2025 को पति के रिश्तेदारों को आरोपों से उन्मोचित कर दिया था। इसके खिलाफ नीतेश शर्मा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

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न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेश न्यायसंगत और कानून के अनुसार हैं। कोर्ट ने कहा, कि वैवाहिक विवाद में पति के रिश्तेदारों का केवल नाम लेना, उनकी सक्रिय संलिप्तता दिखाने वाले स्पष्ट और विशिष्ट आरोप के बिना, उनके खिलाफ कार्यवाही के लिए पर्याप्त नहीं है। अक्सर देखा जाता है कि शादी के तुरंत बाद घर के पूरे परिवार को सामान्य तरीके से फंसाने की प्रवृत्ति होती है।

राज्य की ओर से पेश एजीए ने तर्क दिया कि आरोप सामान्य और व्यापक प्रकृति के हैं। उन्मोचित किए गए आरोपियों के खिलाफ धारा 498ए, 323, 354ए, 506 आईपीसी और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत कोई विशिष्ट कृत्य साबित नहीं होता। उनका अलग रहना भी उन्मोचन का आधार बना।

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याची के वकील ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों की विस्तृत विवेचना कर गलती की है, जबकि उन्मोचन के चरण में सिर्फ प्रथम दृष्टया मामला देखा जाता है। सभी आरोपियों ने मानसिक यातना दी, जिसे अनदेखा किया गया।

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने सिर्फ यह देखा कि आरोपों के मूल तत्व बनते हैं या नहीं, जो कानूनन सही है। कोर्ट ने कहा कि निश्चित आरोपों और सहायक सामग्री के अभाव में रिश्तेदारों के खिलाफ कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके साथ ही कोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत दायर याचिका को खारिज कर दिया।

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