महिला को अपने शरीर के बारे में निर्णय लेने का अधिकार, रेप पीड़िता को गर्भपात की मिली अनुमति
प्रयागराज की एक कोर्ट ने एक 16 वर्षीय रेप पीड़िता के गर्भ समापन की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा है कि अपने शरीर और प्रजनन संबंधी मामलों में निर्णय लेने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के अधिकार का अभिन्न अंग है।

UP News: प्रयागराज की अपर जिला एवं सत्र न्यायालय ने एक पीड़िता को गर्भ समापन की अनुमति दी है। साथ ही कहा है कि किसी महिला को अपने शरीर और प्रजनन से जुड़े फैसले लेने का पूरा अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मामले की सुनवाई के दौरान विशेष लोक अभियोजक सविता पाठक ने मेडिकल रिपोर्ट पेश की, जिसमें बताया गया कि पीड़िता करीब सात सप्ताह की जुड़वा गर्भावस्था से गुजर रही थी। 19 मार्च को प्रयागराज के जिला महिला अस्पताल में किए गए अल्ट्रासाउंड में दोनों भ्रूण जीवित पाए गए थे। सुनवाई कर रहीं अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अंजू कनौजिया ने कहा कि महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन संबंधी निर्णयों का सम्मान किया जाना चाहिए। किसी महिला का अपने शरीर के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार, विशेष रूप से प्रजनन संबंधी मामलों में, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि नाबालिगों और अनचाही गर्भावस्था से जुड़े मामलों में महिलाओं के प्रजनन अधिकारों पर अनावश्यक बाधाएं नहीं लगाई जा सकतीं, क्योंकि ऐसा करना उनके संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने जैसा होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िता के परिजनों ने 9 मई को ही जांच अधिकारी को गर्भावस्था की जानकारी दे दी थी, लेकिन इसके बावजूद गर्भपात की प्रक्रिया को लेकर समय पर कोई कदम नहीं उठाया गया।
न्यायालय ने मामले की परिस्थितियों और पीड़िता की स्थिति को ध्यान में रखते हुए गर्भपात की अनुमति को उचित ठहराया। अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि महिला की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन संबंधी अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित हैं। साथ ही, संबंधित चिकित्सा अधिकारियों को कानून के प्रावधानों के अनुरूप आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए।
मामला लंबित होने पर पासपोर्ट रोकने का अधिकार नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अन्य आदेश में कहा है कि केवल आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर किसी नागरिक के पासपोर्ट आवेदन को बिना किसी आदेश के लटकाया नहीं जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रशांत की खंडपीठ ने मरियम बानो की याचिका पर उसके अधिवक्ता निर्भय कुमार भारती को सुनकर दिया है। एडवोकेट निर्भय भारती ने कोर्ट को बताया कि क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय ने आपराधिक मामला लंबित होने की वजह से याची के पासपोर्ट पर कोई निर्णय नहीं लिया।
कोर्ट ने पवन कुमार राजभर बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कहा कि जांच के स्तर पर किसी आपराधिक मामले का लंबित होना पासपोर्ट आवेदन को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। साथ ही हर्षित वैश बनाम यूपी राज्य व विदेश मंत्रालय के छह दिसंबर 2024 के कार्यालय ज्ञाप का जिक्र करते हुए कहा कि अलग से किसी एनओसी की आवश्यकता नहीं है लेकिन संबंधित अदालत से विदेश यात्रा की अनुमति का आदेश होना अनिवार्य है। यदि कोर्ट ने पासपोर्ट की अवधि तय नहीं की है तो 25 अगस्त 1993 के नोटिफिकेशन के अनुसार पासपोर्ट एक वर्ष की अवधि के लिए जारी किया जाएगा। कोर्ट ने याची मरियम बानो को एक महीने के भीतर क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी के समक्ष नया प्रतिवेदन प्रस्तुत करें। साथ ही पासपोर्ट अधिकारी को इस प्रतिवेदन पर विचार कर नियमों व कानूनी फैसलों को ध्यान में रखते हुए तीन महीने के भीतर पासपोर्ट जारी करने पर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया है।




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