एसिड अटैक पीड़ितों को सरकारी नौकरियों में मिलेगा आरक्षण, हाईकोर्ट के निर्देश पर सरकार का बड़ा कदम
एसिड अटैक पीड़ितों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ दिया जाएगा। यूपी सरकार ने दिव्यांगों के लिए सरकारी नौकरियों में चार फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की है। इसमें ही एसिड अटैक पीड़ितों के लिए पदों को चिह्नित करते हुए आरक्षण का लाभ दिया जाएगा।

UP News: यूपी में एसिड अटैक पीड़ितों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ अनिवार्य रूप से दिया जाएगा। राज्य सरकार ने दिव्यांगों के लिए सरकारी नौकरियों में चार फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की है। इसमें ही एसिड अटैक पीड़ितों के लिए पदों को चिह्नित करते हुए आरक्षण का लाभ दिया जाएगा। विभागों को इनके लिए पद चिह्नित करने का निर्देश दे दिया गया है। उच्च स्तर पर हुई बैठक के बाद इस संबंध में अपर मुख्य सचिव महिला कल्याण लीना जौहरी द्वारा सभी विभागों को पत्र भेजा गया है। हाईकोर्ट द्वारा एसिड अटैक पीड़ित महिलाओं को समुचित क्षतिपूर्ति व पुनर्वास के संबंध में दिए गए निर्देश के आधार पर यह बैठक हुई थी।
यूपी में 40% से अधिक दिव्यांगता वालों को यूनिक डिसेबिलिटी आईडी देने की व्यवस्था है। कुष्ठावस्था पेंशन में 3000 रुपये हर माह, परिवहन निगम की बसों में मुफ्त यात्रा और कृत्रिम अंग दिया जाता है। एसिड अटैक पीड़ित महिलाओं को इन तीनों योजनाओं का लाभ देने के लिए दिव्यांगता प्रतिशत व आय सीमा की पात्रता शर्तों को शिथिल करने पर भी विचार किया जा सकता है।
बर्न यूनिट में होगा विशेष इंतजाम
प्रदेश में मौजूदा समय छह मेडिकल कॉलेजों में बर्न यूनिट है। इसमें एसिड अटैक पीड़ितों व अन्य बर्न मरीजों के मुफ्त उपचार, सर्जरी की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त जिन मेडिकल कॉलेजों में बर्न यूनिट नहीं है, वहां सर्जरी विभाग में कुछ बेड बर्न पेशेंट के लिए आरक्षित किए गए हैं। बैठक में यह तय किया गया है कि बर्न यूनिट में एसिड अटैक पीड़ितों की मदद के लिए विशेष इंतजाम किए जाएं, जिससे उन्हें तुरंत उपचार मिल सके।
एक हजार पेंशन में सम्मानजनक जीवन मुमकिन नहीं
उधर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में एसिड अटैक के पीड़ितों के मुआवजे और उनके स्थायी पुनर्वास को लेकर राज्य सरकार के ढुलमुल रवैये पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने साफतौर पर कहा कि वर्तमान दौर में एसिड अटैक पीड़िता को मात्र एक हजार रुपये प्रतिमाह की पेंशन देना उसके साथ मज़ाक है, क्योंकि इससे सम्मानजनक जीवन जीना मुमकिन नहीं है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने फ़रहा की याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के 10 साल बाद भी नीति नहीं
हाईकोर्ट ने इस बात पर आश्चर्य और दुख व्यक्त किया कि परिवर्तन केंद्र बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और लक्ष्मी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने अब तक एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कोई ठोस और ढांचागत नीति तैयार नहीं की है। कोर्ट ने कहा कि 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने 10 लाख रुपये मुआवजे को भी कम माना था। आज 2026 में, जब महंगाई और जीवन यापन की लागत इतनी बढ़ चुकी है, तब भी सरकार पुरानी व्यवस्था पर टिकी है।




साइन इन