नियमित प्रधानाचार्य के वेतन के हकदार हैं कार्यवाहक प्रिंसिपल, हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि अनुदानित संस्थानों में कार्यरत कार्यवाहक प्रधानाचार्य बिना किसी अतिरिक्त राहत, नियमित प्रधानाचार्य को मिलने वाले वेतन के हकदार हैं।

Allahabad Highcourt: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि अनुदानित संस्थानों में कार्यरत कार्यवाहक प्रधानाचार्य बिना किसी अतिरिक्त राहत, नियमित प्रधानाचार्य को मिलने वाले वेतन के हकदार हैं। कोर्ट ने कहा कि नियमित प्रधानाचार्य की नियुक्ति तक उन्हें कार्य करने का अधिकार है लेकिन नियमित नियुक्ति के आते ही पद छोड़ना होगा। यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह एवं न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने पांच विशेष अपीलों को स्वीकार करते हुए दिया है। तीन महीने में पद के वेतन का भुगतान का आदेश देते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि अपीलार्थी तब तक पद पर बने रहेंगे, जब तक नियमित नियुक्ति नहीं होती।
कोर्ट ने धनेश्वर सिंह चौहान बनाम डीआईओएस, नर्मदेश्वर मिश्र बनाम डीआईओएस, सालोमन मोरार झा बनाम डीआईओएस देवरिया के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि कार्यवाहक प्रधानाचार्यों को नियमित प्रधानाचार्य के समान वेतन मिलना चाहिए विशेषकर तब, जब पद 30 दिन से अधिक समय तक खाली हो। अपीलार्थियों ने एकल पीठ के निर्णय को चुनौती दी थी। खंडपीठ ने संदर्भ के लिए वीरेश चंद्र मिश्र व दो अन्य का मामला लिया। वीरेश चंद्र मिश्र सेवा चयन बोर्ड द्वारा रसायन विज्ञान के व्याख्याता नियुक्त किए गए थे। उन्हें उसी वर्ष स्वतंत्र भारत अंतर महाविद्यालय सुरजावली वाया खुर्जा बुलंदशहर आवंटित किया गया। यहां तत्कालीन प्रधानाचार्य अनिल कुमार ने त्यागपत्र देने के साथ ही याची को कार्यभार सौंप दिया, जो संस्थान में सबसे वरिष्ठ व्याख्याता थे।
प्रधानाचार्य पद के अनुसार नहीं दिया वेतन
उन्होंने प्रधानाचार्य के रूप में कार्य किया लेकिन उन्हें प्रधानाचार्य पद के अनुसार वेतन नहीं दिया गया। अन्य याचिकाओं के तथ्यों में थोड़ा अंतर था। अपीलार्थियों को संबंधित संस्थानों के प्रधानाचार्य के रूप में कार्यवाहक के अनुरूप वेतन दिया जा रहा था लेकिन शिक्षा आयोग अधिनियम लागू होने पर उसे रोक दिया गया। नए कानून में साफतौर पर प्रावधान है कि प्रबंध समिति या जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा रिक्त पद विज्ञापित किए बगैर तदर्थ नियुक्ति नहीं की जाएगी। कोर्ट ने पाया कि अपीलार्थी के शिक्षा संस्थानों के प्रबंधन ने निदेशक माध्यमिक शिक्षा को शिक्षा आयोग अधिनियम की धारा 10 के तहत रिक्तियों की संख्या की सूचना नहीं दी जबकि हर वर्ष की 15 जुलाई तक दी जानी चाहिए। उपनियम यह है कि यदि प्रबंधन सूचना देने में विफल रहता है तो प्राधिकृत अधिकारी के रूप में डीआईओएस रिक्तियों का निर्धारण कर आयोग को सूचित करेंगे।
कार्यवाहक प्रधानाचार्यों की आवश्यकता पूरी तरह समाप्त
याचिकाओं के तथ्यों से स्पष्ट था कि प्रबंध समिति और डीआईओएस ने निर्धारित नियम की अनदेखी की। कोर्ट ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि विधायिका ने कार्यवाहक प्रधानाचार्यों की आवश्यकता को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। यह मौलिक तथ्य है कि कोई भी शैक्षिक संस्थान प्रशासनिक प्रमुख के बिना कार्य नहीं कर सकता, जिसे प्रधानाचार्य कहा जाता है। कार्यवाहक प्रधानाचार्यों की नियुक्ति के लिए कोई प्रत्यक्ष प्रावधान न होने का कारण संभवत: विधायिका की यह मंशा नहीं होना है कि सभी परिस्थितियों में कार्यवाहक प्रधानाचार्यों की नियुक्ति की जाए। संबंधित प्राधिकरण इस मुद्दे पर ध्यान दें और उचित दिशा-निर्देश जारी करें ताकि शैक्षिक संस्थानों में स्थिरता और गुणवत्ता बनी रहे। अन्य अपीलार्थियों में देवरिया के घनश्याम सिंह, वाराणसी के शिवराज मिश्र, बुलंदशहर की समिता, महाराजगंज के अरुण कुमार मिश्र व 15 अन्य शामिल हैं।




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