फतेहपुर में 38 साल पुराने हत्याकांड में आरोपी बरी, कोर्ट ने कहा-संदेह से परे नहीं थे सबूत
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर के बहुचर्चित 1986 के हत्याकांड में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए एक आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर के बहुचर्चित 1986 के हत्याकांड में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए एक आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। सजायाफ्ता जगदीश की अपील पर न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जेके उपाध्याय की खंडपीठ ने सुनवाई की।
मामला थाना खागा, फतेहपुर का है। 18 जुलाई 1986 को कुंजल प्रसाद की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि बचन सिंह, जगदीश, जोगेश्वर और राम कुमार ने मिलकर सुबह करीब 8 बजे गवियन तालाब के पास कुंजल को घेरकर गोली मार दी। सत्र न्यायालय ने 1987 में आरोपियों को धारा 302/34 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया था, जिसके खिलाफ यह आपराधिक अपील दाखिल की गई थी। अपील लंबित रहने के दौरान एक आरोपी राम कुमार की मृत्यु हो गई, जिससे उसके खिलाफ अपील समाप्त हो गई। अभियोजन ने आरोपों को साबित करने के लिए दो प्रत्यक्षदर्शी गवाहों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट को पेश किया।
कोर्ट ने इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद पाया कि दोनों चश्मदीद गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते। एक ने कहा कि वे साथ घर से निकले, जबकि दूसरे ने कहा कि रास्ते में अचानक मुलाकात हुई। गवाहों की घटना स्थल पर उपस्थिति भी संदेहास्पद पाई गई। गांव में मजदूर उपलब्ध होने के बावजूद दूसरे गांव जाने का कारण अविश्वसनीय लगा। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच पुरानी रंजिश थी, जिससे झूठा फंसाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
गवाहों ने अपने बयान में 3 गोलियां चलने की बात कही, जबकि डॉक्टर ने 4 फायर के निशान बताए। डॉक्टर के अनुसार एक गोली बहुत करीब (4 फीट से कम दूरी) से चली, जबकि गवाहों ने 7–10 कदम दूरी बताई। पोस्टमार्टम में शरीर की स्थिति भी घटनाक्रम से मेल नहीं खाती। कोर्ट ने कहा कि यदि आरोपी बदला लेना चाहते थे तो प्रत्यक्षदर्शी बेटे को क्यों छोड़ा गया। इससे पूरी कहानी संदिग्ध हो जाती है।
हाईकोर्ट ने कहा, 'जब घटनाक्रम और साक्ष्य ही संदेहास्पद हों, तो दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।' अदालत ने माना कि अभियोजन का मामला संदेह से परे साबित नहीं हो पाया, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना उचित है। कोर्ट ने आरोपी जगदीश को बरी करने का आदेश देते उसकी जमानत समाप्त कर दी गई और जमानतदारों को मुक्त कर दिया।




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