यूपी का फौजियों वाला गांव, यहां का हर युवा बनना चाहता है सैनिक, जानें वजह
यूपी के गोंडा जिले के एक गांव के युवाओं के लिए भारतीय सेना में जाना अब केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक फैशन बन गया है। यही कारण है कि इस छोटे से गांव के एक दर्जन से अधिक लोग सेना में भर्ती होकर देश की सेवा कर रहे हैं। इस गांव को लोग फौजियों वाला गांव के नाम से जानते हैं।

यूपी के गोंडा जिले के मनकापुर कोतवाली क्षेत्र के एक गांव के युवाओं के लिए भारतीय सेना में जाना अब केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक फैशन बन गया है। इस गांव का हर युवा फौजी बनने का सपना देखता है। यही कारण है कि इस छोटे से गांव के एक दर्जन से अधिक लोग सेना या अर्द्धसैनिक बलों में भर्ती होकर देश की सेवा कर रहे हैं। इलाके के लोग अब इस गांव को 'फौजियों वाला गांव' कहकर बुलाते हैं।
चर्चा हो रही है मनकापुर स्थित आईटीआई परिसर से सटे मऊ गांव की। पिछले कुछ सालों में यहां के महेश उपाध्याय, रविकांत उपाध्याय, शैलेंद्र उपाध्याय, पवन कुमार उपाध्याय, पंकज उपाध्याय, महेश कुमार तिवारी, शिव शंकर तिवारी, राम शंकर यादव, विक्रम यादव, राम विलास यादव, राकेश मिश्रा, कैप्टन तिवारी समेत एक दर्जन से अधिक युवा वर्दी पहनकर देश के अलग-अलग हिस्सों में तैनात हैं।
फौजियों के एक परिवार से मिली प्रेरणा
इस जुनून की शुरुआत गांव के शांति प्रसाद उपाध्याय (अब मृतक) के परिवार से हुई थी, जो सबसे पहले फौज में भर्ती हुए थे। उनके बाद उनके बेटे शांति प्रसाद उपाध्याय और दिनेश कुमार उपाध्याय ने भी सेना ज्वाइन की। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। इस परिवार की लगातार तीन पीढ़ियों को देखकर गांव के अन्य युवा प्रेरित हुए और उन्होंने भी फौज को अपना करियर बनाया।
रिटायर्ड फौजी अनिरुद्ध उपाध्याय बताते हैं कि इस परिवार की देखा-देखी गांव के कई अन्य लोग फौज में शामिल हुए। आज भी गांव के कई युवा तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि फौज में अग्निवीर योजना लागू होने के बाद युवाओं का जोश कुछ ठंडा ज़रूर पड़ा है, लेकिन देश सेवा का जुनून आज भी इस गांव के युवाओं के रगों में दौड़ता है।
सुबह-शाम दिखती है तैयारी
मऊ गांव के युवा आज भी फौज में जाने की तैयारी में जुटे दिखते हैं। वह रोज़ाना सुबह और शाम गांव के बाहर खाली पड़ी भूमि पर सपाट (पुश-अप) लगाते और सड़कों पर दौड़ते नजर आते हैं। पुराने दिनों को याद करते हुए ग्रामीण बताते हैं कि जब पास की आईटीआई फैक्ट्री चल रही थी, तब परिसर की लाइटों के कारण गांव के बाहर की भूमि पर खूब उजाला रहता था। उस समय युवा आधी रात तक उसी उजाले में फिजिकल परीक्षा की तैयारी करते थे, जो उनके समर्पण को दर्शाता है।




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