उदयपुर के मेनार में बारूद की होली,मुगल चौकी पर जीत की याद में रातभर चलीं तोप-बंदूकें
राजस्थान की धरती वीरता, परंपराओं और अनोखी लोक संस्कृति के लिए जानी जाती है। यहां होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि इतिहास और शौर्य की गाथाओं को जीवंत करने का अवसर भी बन जाती है।

राजस्थान की धरती वीरता, परंपराओं और अनोखी लोक संस्कृति के लिए जानी जाती है। यहां होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि इतिहास और शौर्य की गाथाओं को जीवंत करने का अवसर भी बन जाती है। उदयपुर से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित मेनार गांव में बुधवार रात ऐसा ही अद्भुत नजारा देखने को मिला, जब यहां 451 साल पुरानी परंपरा के तहत ‘बारूद की होली’ खेली गई।
आधी रात को लाल पगड़ियां, पारंपरिक पोशाक और हाथों में तलवारें लिए ग्रामीण जब चौक में इकट्ठा हुए तो माहौल किसी युद्धभूमि जैसा लगने लगा। चारों ओर तोपों की गर्जना, बंदूकों की गूंज और ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच गांव ने एक बार फिर मुगल चौकी पर मिली ऐतिहासिक जीत की याद को जीवंत कर दिया।
शौर्य की याद में बारूद की होली
मेनारिया ब्राह्मण समाज इस परंपरा को सदियों से निभाता आ रहा है। मान्यता है कि मेवाड़ में महाराणा अमर सिंह के समय इस क्षेत्र में मुगलों की छावनियां स्थापित थीं। मेनार गांव के पूर्वी छोर पर भी एक मुगल चौकी थी, जिससे स्थानीय लोग परेशान रहते थे।
जब मेनारवासियों को वल्लभनगर की मुगल छावनी पर जीत की खबर मिली तो गांव के लोगों ने ओंकारेश्वर चबूतरे पर एकत्र होकर रणनीति बनाई। इसके बाद उन्होंने मुगल चौकी पर हमला कर उसे ध्वस्त कर दिया। इसी जीत की खुशी में हर साल जमरा बीज की रात यहां बारूद की होली खेली जाती है।
गांव बना युद्धभूमि जैसा दृश्य
रात करीब 10:15 बजे से आयोजन की रस्में शुरू हुईं। पारंपरिक धोती-कुर्ता और कसुमल पाग (लाल साफा) बांधे युवक और बुजुर्ग तलवारें और बंदूकें लेकर घरों से निकले। अलग-अलग रास्तों से ललकारते हुए वे गोलियां दागते और तलवारें लहराते हुए ओंकारेश्वर चौक पहुंचे।
इसके बाद गांव के पांच रास्तों की प्रतीकात्मक मोर्चाबंदी की गई। पांच टुकड़ियां मशालें लेकर ढोल की थाप पर गांव के अलग-अलग मार्गों पर निकलीं। जब सभी दल एक साथ आगे बढ़े तो पूरे गांव में जोश और रोमांच का माहौल बन गया। हजारों लोग इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बने।
तलवारों के साथ गैर नृत्य
ओंकारेश्वर चौक में पहुंचते ही तोपों में बारूद भरकर धमाके किए गए। इसके साथ ही बंदूकों से हवाई फायरिंग हुई और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच तलवारों के साथ पारंपरिक ‘गैर’ नृत्य शुरू हुआ। बुजुर्गों से लेकर युवा तक इस आयोजन में बराबर जोश के साथ शामिल हुए।
इस दौरान गांव के लोग मशालें लेकर रास्तों की निगरानी करते दिखाई दिए। पूरे माहौल में वीरता, गर्व और उत्साह का अद्भुत संगम नजर आया।
महिलाओं ने निभाई खास भूमिका
इस आयोजन में महिलाओं की भूमिका भी अहम रही। महिलाएं सिर पर मंगल कलश रखकर बोचरी माता की घाटी तक पहुंचीं, जहां मुगल चौकी पर जीत की शौर्य गाथा पढ़ी गई। इसके बाद महिलाओं ने वीर रस के गीत गाए और मुख्य होली को ठंडा करने की पारंपरिक रस्म निभाई।
ढोल-नगाड़ों के साथ पुरुष तलवारों और डंडों के साथ करतब दिखाते रहे, जबकि महिलाएं गीतों के जरिए वीरता की कहानी सुनाती रहीं।
जाजम बिछाकर की मेहमाननवाजी
बारूद की होली की शुरुआत दोपहर से ही हो गई थी। ओंकारेश्वर मंदिर चौक में शाही लाल जाजम बिछाकर मेनारिया ब्राह्मण समाज के पंचों और बुजुर्गों का स्वागत किया गया। इसके बाद जैन समाज के लोगों ने अबीर-गुलाल उड़ाकर होली की शुभकामनाएं दीं।
यह आयोजन सिर्फ गांव तक सीमित नहीं रहा। इसे देखने के लिए महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और विदेशों तक से लोग मेनार पहुंचे।
विदेशों से भी लौटे लोग
मेनार के कई लोग विदेशों में खानदानी शेफ के रूप में काम करते हैं। दुबई समेत कई देशों में रहने वाले लोग भी इस परंपरा में शामिल होने के लिए हर साल गांव लौटते हैं। हालांकि इस बार अंतरराष्ट्रीय हालात और फ्लाइट बंद होने के कारण कुछ लोग नहीं आ सके।
दुनिया भर में प्रसिद्ध हो रही परंपरा
इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण मेनार की यह अनोखी होली अब दुनिया भर में पहचान बना रही है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि पहले यह आयोजन सिर्फ स्थानीय स्तर पर प्रसिद्ध था, लेकिन अब देश-विदेश से लोग इसे देखने पहुंचते हैं।
राजस्थान की लोक परंपराओं में मेनार की बारूद की होली एक ऐसी विरासत बन चुकी है, जो इतिहास, शौर्य और सांस्कृतिक गौरव को एक साथ जीवंत करती है। यहां रंगों से ज्यादा बारूद की गूंज सुनाई देती है, लेकिन इसके पीछे छिपी कहानी मेवाड़ की वीरता की अमर गाथा को आज भी जिंदा रखती है।
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