गर्दन के काले धब्बे और बार-बार रैशेज… त्वचा दे रही ये चेतावनी,राजस्थान में बढ़ रहा खतरा
भारत में तेजी से बढ़ रहा मोटापा अब केवल जीवनशैली से जुड़ी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। आमतौर पर मोटापे की चर्चा मधुमेह, हृदय रोग या जोड़ों के दर्द से जोड़कर की जाती है,

भारत में तेजी से बढ़ रहा मोटापा अब केवल जीवनशैली से जुड़ी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। आमतौर पर मोटापे की चर्चा मधुमेह, हृदय रोग या जोड़ों के दर्द से जोड़कर की जाती है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसके शुरुआती संकेत कई बार त्वचा पर दिखाई देने लगते हैं, जिन्हें लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
जयपुर के एंडोक्रिनोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. मनोज खंडेलवाल के अनुसार, शरीर का सबसे बड़ा अंग यानी त्वचा कई बार शरीर के अंदर चल रहे मेटाबॉलिक बदलावों का पहला संकेत देती है। यदि इन संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए तो भविष्य में गंभीर बीमारियों से बचाव संभव हो सकता है।
आंकड़े बता रहे समस्या की गंभीरता
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार भारत में 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग के लगभग हर चार में से एक वयस्क अधिक वजन या मोटापे से प्रभावित है। वहीं ICMR-INDIAB अध्ययन के मुताबिक देश में करीब 25 करोड़ से अधिक वयस्क सामान्य मोटापे और 35 करोड़ से ज्यादा लोग पेट के मोटापे से जूझ रहे हैं।
राजस्थान भी इस ट्रेंड से अछूता नहीं है। शहरी इलाकों में बदलती जीवनशैली, कम शारीरिक गतिविधि और फास्ट फूड की बढ़ती आदतों के कारण मोटापे के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। जयपुर, जोधपुर और कोटा जैसे शहरों में डॉक्टरों के पास मोटापे से जुड़ी मेटाबॉलिक समस्याओं के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं।
त्वचा पर दिखते हैं शुरुआती संकेत
विशेषज्ञों के मुताबिक मोटापे का सबसे पहचानने योग्य संकेत “अकैंथोसिस नाइग्रिकन्स” (Acanthosis Nigricans) है। इसमें गर्दन, बगल, जांघों के जोड़ या उंगलियों के जोड़ों पर काले, मोटे और मखमली धब्बे दिखाई देते हैं।
अक्सर लोग इसे धूप का असर, धूल-मिट्टी या साफ-सफाई की कमी मान लेते हैं, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार यह कई बार इंसुलिन रेजिस्टेंस का शुरुआती संकेत हो सकता है और भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ने की चेतावनी भी देता है।
त्वचा की सिलवटों में बढ़ते संक्रमण
जैसे-जैसे शरीर का वजन बढ़ता है, त्वचा में गहरी सिलवटें बनने लगती हैं—जैसे गर्दन, बगल, स्तनों के नीचे और पेट के आसपास। इन जगहों पर नमी और गर्माहट ज्यादा रहती है, जो फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण के लिए अनुकूल वातावरण बना देती है।
इस कारण खुजली, लालिमा, जलन और बार-बार रैशेज की समस्या देखने को मिलती है। कई लोग बार-बार दवा लेते हैं, लेकिन असल कारण यानी अधिक वजन पर ध्यान नहीं देते।
स्किन टैग और स्ट्रेच मार्क्स भी संकेत
डॉ. खंडेलवाल बताते हैं कि मोटापा केवल त्वचा के रंग या बनावट को ही नहीं बदलता, बल्कि यह स्किन टैग, स्ट्रेच मार्क्स, अत्यधिक पसीना और सोरायसिस जैसी समस्याओं को भी बढ़ा सकता है।
असल में शरीर का वसा ऊतक यानी एडिपोज टिशू केवल चर्बी नहीं होता, बल्कि यह मेटाबॉलिक रूप से सक्रिय होता है और सूजन पैदा करने वाले तत्व छोड़ता है। यही कारण है कि मोटापा एक तरह की क्रॉनिक इंफ्लेमेटरी स्थिति बन जाता है, जिसका असर त्वचा पर साफ दिखाई देता है।
घाव भरने में भी होती है देरी
मोटापे से ग्रस्त लोगों में एक और गंभीर समस्या देखी जाती है—घाव भरने में देरी। छोटे कट या खरोंच भी सामान्य से अधिक समय में भरते हैं।
इसके पीछे शुगर मेटाबॉलिज्म में गड़बड़ी, रक्त संचार में कमी और शरीर में लगातार बनी रहने वाली सूजन प्रमुख कारण माने जाते हैं। यही वजह है कि सर्जरी के बाद भी संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
समय रहते पहचान जरूरी
डॉक्टरों के अनुसार त्वचा में दिखने वाले इन बदलावों को केवल कॉस्मेटिक समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार यह शरीर के अंदर चल रहे मेटाबॉलिक असंतुलन—जैसे इंसुलिन रेजिस्टेंस या अनडायग्नोज्ड डायबिटीज—का संकेत हो सकते हैं।
वजन कम करने से मिल सकता है लाभ
विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और वजन नियंत्रण से इन समस्याओं में काफी सुधार संभव है। थोड़ी-सी भी वजन कमी इंसुलिन सेंसिटिविटी को बेहतर बना सकती है, सूजन कम कर सकती है और त्वचा संबंधी समस्याओं की आवृत्ति घटा सकती है।
साथ ही त्वचा की सिलवटों की साफ-सफाई बनाए रखना और लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षणों की स्थिति में डॉक्टर से परामर्श लेना भी जरूरी है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मोटापा केवल दिखावे या सौंदर्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर के मेटाबॉलिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय है। शरीर की त्वचा कई बार इसकी कहानी सबसे पहले बयां कर देती है—जरूरत है उन संकेतों को समय रहते पहचानने और सही कदम उठाने की।
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