तोप-तलवार और हवाई फायरिंग… ये है राजस्थान की सबसे अनोखी होली
देशभर में होली रंग-गुलाल, अबीर और ठहाकों के साथ मनाई जाती है, लेकिन राजस्थान में एक ऐसा गांव भी है जहां होली के तीसरे दिन रंगों से ज्यादा बारूद की गूंज सुनाई देती है। यहां लाठियों की जगह बंदूकें दहाड़ती हैं और पटाखों के साथ छोटी तोपों की गर्जना होती है।

देशभर में होली रंग-गुलाल, अबीर और ठहाकों के साथ मनाई जाती है, लेकिन राजस्थान में एक ऐसा गांव भी है जहां होली के तीसरे दिन रंगों से ज्यादा बारूद की गूंज सुनाई देती है। यहां लाठियों की जगह बंदूकें दहाड़ती हैं और पटाखों के साथ छोटी तोपों की गर्जना होती है। यह अनोखी परंपरा 500 साल से भी ज्यादा समय से निभाई जा रही है।
हम बात कर रहे हैं उदयपुर से करीब 45 किलोमीटर दूर बसे मेनार गांव की, जहां ‘जमराबीज’ के दिन होली एक अलग ही अंदाज में मनाई जाती है।
जहां तोप-तलवार से मनती है होली
मेनार में होली का तीसरा दिन किसी युद्ध के दृश्य जैसा नजर आता है। आधी रात के बाद गांव में धमाकों की आवाजें गूंजने लगती हैं। हालांकि यहां रंगों से होली भी खेली जाती है, लेकिन असली परंपरा बारूद वाली होली की है।
गांव के ओंकारेश्वर चबूतरे पर लाल दरी बिछाकर आयोजन की शुरुआत होती है। ग्रामीण एकत्र होते हैं, पारंपरिक भोजन करते हैं और फिर शाम ढलते ही ‘छद्म युद्ध’ की तैयारी शुरू हो जाती है। मशालें थामे युवा पांच दलों में बंट जाते हैं। सभी दल अलग-अलग दिशाओं से गांव के प्रमुख मंदिर चारभुजा के चौराहे की ओर बढ़ते हैं।
नेतृत्वकर्ता के संकेत मिलते ही एक साथ हवाई फायरिंग शुरू होती है। सफेद धोती-कुर्ता और सिर पर पगड़ी पहने युवक बंदूकों से फायर करते हैं, वहीं छोटी मगर तेज आवाज वाली तोपें भी दागी जाती हैं। देर रात तक गांव बारूद और जयकारों की गूंज से थर्राता रहता है।
महाराणा की वीरता की याद
ग्रामीणों के मुताबिक यह परंपरा मेवाड़ के वीर शासक महाराणा अमर सिंह के दौर से जुड़ी है। बताया जाता है कि उस समय मेवाड़ में मुगलों की छावनियां जगह-जगह स्थापित थीं। मेनार के पूर्वी क्षेत्र में भी मुगल सैनिक डेरा डाले हुए थे और उनके अत्याचार से गांववासी परेशान थे।
सन् 1657 के आसपास गांव के ब्राह्मणों समेत सभी जातियों के लोग एकजुट हुए। गांव छोटा था और मुगलों की तादाद अधिक, इसलिए सीधा युद्ध संभव नहीं था। तब रणनीति बनी कि बहाना होली का होगा, लेकिन अंत जश्न मुगलों को खदेड़ने का होगा।
जब होली बनी युद्ध का संकेत
कहते हैं कि तय दिन होली के बहाने गांव के लोग एकत्र हुए। जो दूर थे, उन्हें संकेत देने के लिए ओंकारेश्वर चबूतरे पर ढोल बजाया गया। यह जंग का इशारा था। मुगल सेना को भनक तक नहीं लगी।
होली खेलते-खेलते गांव के वीर हथियारों के साथ मुगलों की छावनी पर टूट पड़े। अचानक हुए हमले से दुश्मन हतप्रभ रह गया। सुबह से शुरू हुई लड़ाई देर रात तक चली। अंततः मेनार के लोगों ने छावनी को ध्वस्त कर मेवाड़ के इस हिस्से को मुगलों के आतंक से मुक्त कराया।
उसी जीत की स्मृति में आज भी यह परंपरा निभाई जाती है।
परंपरा और सावधानी का संगम
सबसे दिलचस्प बात यह है कि तलवार और बंदूक के प्रदर्शन के बावजूद आज तक किसी के घायल होने की घटना सामने नहीं आई। ग्रामीण इसे अनुशासन और सावधानी का परिणाम मानते हैं। हथियारों का उपयोग पूरी सतर्कता के साथ किया जाता है और केवल हवाई फायरिंग की जाती है।
बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इस अनोखी होली का हिस्सा बनते हैं। गांव में इसे गौरव और शौर्य की परंपरा माना जाता है।
राजस्थान की निराली होलियां
राजस्थान में होली के कई रंग हैं। शेखावाटी में चंग और गीदड़ नृत्य, जोधपुर में रोने-बिलखने की होली, बीकानेर में डेंगा मार, जैसलमेर में कंकड़मार, केकड़ी में अंगारों की होली, भरतपुर-करौली के ब्रज क्षेत्र में लठमार होली और जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर में फूलों की होली—हर जगह का अंदाज अलग है।
लेकिन मेनार की बारूद वाली होली अपनी वीर गाथा और अनूठे स्वरूप के कारण सबसे अलग पहचान रखती है।
होली जहां एक ओर रंगों और रिश्तों का त्योहार है, वहीं मेनार में यह शौर्य, एकता और इतिहास की जीवंत स्मृति बनकर सामने आती है। पांच सदियों बाद भी जब तोपों की गूंज उठती है, तो लगता है जैसे इतिहास आज भी उसी जोश के साथ सांस ले रहा हो।
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