पुराणों से ब्रिटिश दौर तक… जानिए माउंट आबू के आबू राज कहलाने की पूरी कहानी
राजस्थान की Government of Rajasthan ने बजट सत्र के समापन के दौरान बड़ा फैसला लेते हुए राज्य के प्रमुख तीन स्थानों के नाम बदलने की घोषणा की। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा प्रदेश के एकमात्र हिल स्टेशन Mount Abu को लेकर है, जिसे अब आधिकारिक तौर पर ‘आबू राज’ कहा जाएगा।

राजस्थान की Government of Rajasthan ने बजट सत्र के समापन के दौरान बड़ा फैसला लेते हुए राज्य के प्रमुख तीन स्थानों के नाम बदलने की घोषणा की। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा प्रदेश के एकमात्र हिल स्टेशन Mount Abu को लेकर है, जिसे अब आधिकारिक तौर पर ‘आबू राज’ कहा जाएगा। मुख्यमंत्री Bhajanlal Sharma ने इसे सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा कदम बताते हुए कहा कि यह बदलाव स्थानीय विरासत को सम्मान देने की दिशा में उठाया गया है।
अर्बुदांचल से आबू राज तक की कहानी
इतिहास और पुराणों के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि प्राचीन काल में इस क्षेत्र को ‘अर्बुदांचल’ कहा जाता था। पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान शिव के वाहन नंदी एक गहरी खाई में गिर गए थे, तब अर्बुद नाग ने उनकी सहायता की। उसी नाग के नाम पर यह पर्वत ‘अर्बुद’ कहलाया, जो समय के साथ अपभ्रंश होकर ‘आबू’ बन गया।
एक अन्य मान्यता के मुताबिक, यहीं पर ऋषि वशिष्ठ ने ‘अग्नि कुंड’ से चार प्रमुख राजपूत वंश—चौहान, परमार, सोलंकी और प्रतिहार—की उत्पत्ति की थी। यही कारण है कि आबू पर्वत को राजपूत इतिहास का उद्गम स्थल भी कहा जाता है। वहीं, इसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त अंश माने जाने वाले ऋषि दत्तात्रेय की तपोभूमि भी माना जाता है।
राजवंशों से लेकर अंग्रेजों तक का प्रभाव
आबू पर्वत का इतिहास केवल पौराणिक नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम रहा है। यहां नाग और भील जनजातियों से लेकर गुर्जर-प्रतिहार और चौहान वंश तक का शासन रहा। 11वीं-12वीं शताब्दी में चौहान शासकों का प्रभाव प्रमुख रहा, जबकि सिरोही रियासत के महाराजाओं ने इसे ग्रीष्मकालीन विश्राम स्थल के रूप में विकसित किया।
19वीं सदी में अंग्रेजों की नजर इस ठंडी वादियों वाले इलाके पर पड़ी। 1845 के आसपास सिरोही के महाराव शिव सिंह से इसे लीज पर लेकर अंग्रेजों ने यहां हिल स्टेशन और सैन्य छावनी विकसित की। 1868 में इसे ‘एजेंट टू गवर्नर जनरल’ के निवास के रूप में स्थापित किया गया। उसी दौर में अर्बुदांचल का नाम बदलकर ‘माउंट आबू’ कर दिया गया—एक अंग्रेजी पहचान, जो दशकों तक कायम रही।
आज भी यहां राजस्थान के राज्यपाल का ग्रीष्मकालीन निवास स्थित है, जिसे अंग्रेजों ने ही स्थापित किया था। गर्मियों में राजभवन का कार्य यहां से संचालित होने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।
नाम बदलने के पीछे तर्क
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का कहना है कि ‘माउंट’ शब्द ब्रिटिशकालीन प्रभाव का प्रतीक है। राज्य सरकार का मानना है कि स्थानीय संस्कृति और ऐतिहासिक पहचान को पुनर्स्थापित करने के लिए नाम परिवर्तन आवश्यक था। ‘आबू राज’ नाम इस क्षेत्र की राजसी और ऐतिहासिक गरिमा को दर्शाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह फैसला सांस्कृतिक पुनर्जागरण की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश और दिल्ली की तर्ज पर राजस्थान में भी ऐतिहासिक नामों को पुनर्जीवित करने की पहल के रूप में इसे देखा जा रहा है।
आबू राज के सात बड़े महत्वपूर्ण तथ्य
1. राजस्थान का इकलौता हिल स्टेशन – अरावली पर्वतमाला में स्थित यह प्रदेश का एकमात्र प्रमुख पर्वतीय पर्यटन स्थल है।
2. अर्बुदांचल की पौराणिक पहचान – नंदी और अर्बुद नाग की कथा से जुड़ा ऐतिहासिक महत्व।
3. राजपूत वंशों की उत्पत्ति स्थल – अग्निकुंड कथा के कारण राजपूत इतिहास में विशेष स्थान।
4. दत्तात्रेय की तपोभूमि – धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत पवित्र स्थल माना जाता है।
5. ब्रिटिशकालीन ग्रीष्मकालीन राजधानी – अंग्रेजों ने इसे प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित किया।
6. राज्यपाल का ग्रीष्मकालीन निवास – आज भी शासन-प्रशासन का अहम ठिकाना।
7. पर्यटन और मौसम की खासियत – गर्मियों में भी अपेक्षाकृत ठंडा मौसम, जो इसे अलग पहचान देता है।
नाम बदलने से जुड़ी इस घोषणा ने जहां राजनीतिक हलकों में हलचल मचाई है, वहीं आम जनता और इतिहास प्रेमियों के बीच भी चर्चा तेज हो गई है। ‘माउंट आबू’ से ‘आबू राज’ तक का यह सफर केवल एक नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि विरासत और पहचान के पुनर्स्मरण की कहानी बन गया है।
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