हार से बढ़कर भी एक डर! दिल्ली में क्यों भाजपा के खिलाफ मुकाबले से पीछे हट गई AAP?
आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में 29 अप्रैल को होने जा रहे मेयर और डिप्टी मेयर चुनाव में उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है। चुनावी गणित अरविंद केजरीवाल की पार्टी के पक्ष में नहीं था। हार सुनिश्चित थी और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर होता।

अपने सबसे मजबूत गढ़ दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) के एक फैसले ने कई राजनीतिक पंड़ितों को लगातार दूसरे साल चौंका दिया है। हैरान तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी होगी कि क्यों दिल्ली में एक दशक से अधिक समय तक सरकार चला चुकी 'आप' ने एमसीडी (म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली) में उसके लिए लगातार दूसरे साल खुला मैदान छोड़ दिया है। अचरज इसलिए भी अधिक है क्योंकि महज 9 पार्षद वाली कांग्रेस मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा रही है, लेकिन टक्कर दे पाने में सक्षम होने के बावजूद 'आप' ने उम्मीदवार नहीं उतारने का ऐलान कर दिया।
दिल्ली नगर निगम में मेयर और डिप्टी मेयर पद के लिए 29 अप्रैल को चुनाव होना है। एमसीडी के पार्षद, दिल्ली के निर्वाचित विधायक और सांसद इस चुनाव के वोटर होते हैं और एक साल के लिए मेयर और डिप्टी मेयर चुने जाते हैं। पिछले एमसीडी चुनाव में बहुमत हासिल करने वाली 'आप' दिल्ली की सरकार गंवाने के बाद 'छोटी सरकार'से भी कब्जा गंवा चुकी है। एमसीडी में उसके पार्षदों के एक गुट के अलग हो जाने के बाद ना सिर्फ शासन चला गया बल्कि पार्टी अब मेयर-डिप्टी मेयर पद पर दोबारा चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है।
चुनाव का गणित क्या है
250 सदस्यों वाले नगर निगम में भाजपा के 123 पार्षद हैं, जबकि 'आप' के 100 सदस्य हैं। आप से अलग हुए गुट 'इंद्रप्रस्थ विकास पार्टी' के 15 और कांग्रेस के पास 9 पार्षद हैं। एक सदस्य फॉरवर्ड ब्लॉक से है तो एक निर्दलीय की उपस्थिति है। एक सीट खाली है। मेयर चुनाव में नामित विधायक और सांसद भी वोट डालते हैं और इस वजह से चुनावी गणित थोड़ा और बदल जाता है।
इस साल मेयर और डिप्टी मेयर चुनाव के लिए निर्वाचक मंडल में कुल 273 वोट हैं। इनमें 249 पार्षद, दिल्ली विधानसभा द्वारा नामित 14 विधायक, सात लोकसभा सदस्य और तीन राज्यसभा सदस्य शामिल हैं। किसी भी उम्मीदवार को जीत के लिए 137 मतों की आवश्यकता होगी।
भाजपा के पास 141 वोट हैं तो तीन राज्यसभा सांसदों और तीन विधायकों के साथ उसके 106 सदस्य वोट डाल सकते हैं। कांग्रेस के महज 9 पार्षद ही वोट डालेंगे। गौरतलब है कि 2022 के एमसीडी चुनाव में 'आप' ने 134 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन इस्तीफों और पाला बदल के बाद अब उसके 100 पार्षद ही बचे हैं।
किस बात का डर
राजनीतिक जानकारों की मानें तो आम आदमी पार्टी के चुनाव नहीं लड़ने के पीछे दो मुख्य वजहें नजर आती हैं। पहली तो यह कि पार्टी जानती है कि संख्याबल उसके साथ नहीं है। नैरेटिव जंग के माहिर खिलाड़ी अरविंद केजरीवाल जानते हैं कि यदि उनकी पार्टी ने उम्मीदवार उतारे तो हार सुनिश्चित है और एक बार फिर मीडिया की सुर्खियों में 'भाजपा से मुकाबले में 'आप' की हार' जैसे खबरें होंगी,जिसका कार्यकर्ताओं के मनोबल पर नकारात्मक असर होगा। पार्टी जानती है कि यह हार से भी बड़ा झटका होगा।
एक रणनीति भी
एक दूसरी वजह यह भी है कि अब अगले एमसीडी चुनाव में अधिक समय नहीं बचा है। 2027 के अंत में चुनाव होंगे। 2022 में जीत के बाद एमसीडी की सत्ता उसके हाथ बरकरार नहीं रह सकी। अब यदि पार्टी किसी तरह सत्ता हासिल भी कर ले तो बाकी बचे समय में वह 2022 के वादे पूरे नहीं कर पाएगी। पार्टी चाहती है कि वह अगले चुनाव में विपक्ष में रहते हुए उतरे और जनता के बीच यह संदेश लेकर जाए कि उनके दिए बहुमत को छीन लिया गया और कामकाज नहीं करने दिया गया। पार्टी जनता से पिछले बार के मुकाबले अधिक बड़े जनादेश की मांग कर सकती है।
प्रवेश वाही का मेयर बनाना तय
भाजपा ने रोहिणी से पार्षद प्रवेश वाही को मेयर पद के लिए उम्मीदवार बनाया गया है। मोनिका पंत को डिप्टी मेयर पद के लिए उम्मीदवार बनाया गया है। वहीं, जय भगवान यादव को स्थायी समिति के सदस्य और सदन के नेता पद के लिए उम्मीदवार बनाया गया है और मनीष चड्ढा को स्थायी समिति की सदस्यता के लिए नामित किया गया है। प्रवेश वाही रोहिणी (वार्ड 53-ई) से हैं और उनके निर्विरोध चुने जाने की संभावना जताई जा रही है। मोनिका पंत आनंद विहार (वार्ड 206) से, जय भगवान यादव बेगमपुर (वार्ड 27) से और मनीष चड्ढा पहाड़गंज (वार्ड 82) से हैं।




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