अपलोड किसने किया, डिलीट किए जाएं; जस्टिस स्वर्ण कांता से बहस करते केजरीवाल के वीडियो पर HC सख्त
दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी के अन्य नेताओं, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने पूछा कि 13 अप्रैल को अदालत में जिरह करते केजरीवाल का वीडियो सबसे पहले किसने अपलोड किया?

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की मुश्किलें कम नहीं हो रही हैं। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत से रिक्यूजल याचिका खारिज होने के बाद अब वह जिरह करते वीडियो पर घिर गए हैं। आम आदमी पार्टी के मुखिया, इसके कई नेताओं, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और पत्रकार रवीश कुमार के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को सख्ती दिखाई और सभी वीडियो को डिलीट करने को कहा। अदालत ने यह भी पूछा है कि इस वीडियो को सबसे पहले अपलोड किसने किया?
जस्टिस वी कामेश्वर राव और ज्सिटस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की बेंच ने कहा कि इस तरह की रिकॉर्डिंग वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियमों का उल्लंघन करती हैं और सोशल मीडिया पर इनकी अनुमति नहीं दी जा सकती। अधिवक्ता वैभव सिंह की ओर से दायर याचिका पर अदालत ने अरविंद केजरीवाल, आप नेताओं, दिग्विजय सिंह और पत्रकार रवीश कुमार को नोटिस भी जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई अब 6 जुलाई को होगी। पहले इस केस को जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस कारिया की पीठ के सामने सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन जस्टिस कारिया ने खुद को अलग कर लिया तो दूसरी बेंच के सामने भेजा गया।
वीडियो के पीछे राजनीतिक अजेंडा, बड़ी साजिश: याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि अदालत की अनुमति के बिना कार्यवाही की रिकॉर्डिंग और इनका प्रकाशन नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि 13 अप्रैल की कार्यवाही को ना सिर्फ रिकॉर्ड किया गया बल्कि सोशल मीडिया पर पब्लिश भी किया गया। आम आदमी पार्टी के नेताओं और अन्य के द्वारा साझा किए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसे शेयर करना भी अपलोड करने के बराबर है। उन्होंने कहा कि अदालत की कार्यवाही को स्कैंडलाइज करने के लिए ऐसा किया गया। दिग्विजय सिंह के पोस्ट को पढ़कर भी सुनाया गया। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि केवल उन हिस्सों को साझा किया गया जिनका राजनीतिक अजेंडा है। कार्यवाही के कुछ हिस्सों को साझा करने के पीछे वृहत साजिश है।
मेटा और गूगल ने क्या दिया जवाब
फेसबुक और इंस्ट्राग्राम को संचालित करने वाली कंपनी मेटा और यूट्यूब की पैरेंट कंपनी गूगल के वकील भी सुनवाई में शामिल हुए। अदालत ने पूछा कि क्या यह पता लगाना संभव है सबसे पहले किसने वीडियो को अपलोड किया। मेटा की ओर से बताया गया कि इसके लिए कोई मैकेनिज्म नहीं है। URLs मौजूद हैं और लोगों की पहचान की जा चुकी है। अदालत ने एक बार फिर पूछा कि क्या यह बताया जा सकता है कि किसने सबसे पहले वीडियो को अपलोड किया। इसका जवाब मेटा ने 'ना' में दिया। मेटा ने कहा कि बीएसआई और आईपी लॉग मौजूद है। ईमेल या मोबाइल नंबर दिया जाए तो हम सूचना रखेंगे। जो भी सिस्टम यूज किया गया हो आईपी में आ जाएगा। वह सूचना हम दे सकते हैं। जब अकाउंट बनाया जाता है तो ईमेल आईडी या मोबाइल नंबर दिया जाता है। मोबाइल नंबर के लिए बीएसआई और आईपी लॉग सूचना आ सकती है।
गूगल ने कहा- डिलीट किए यूआरएल
गूगल की ओर से बताया गया कि रजिस्ट्रार जनरल की तरफ से 13 यूआरएल दिए गए थे जिन्हें डिलीट किया जा चुका है। मेटा ने कहा कि जब भी कोई अवैध कॉन्टेंट होता है तो एजेंसी संवाद करती है। अदालत ने कहा कि याचिका ऐसे सभी वीडियो को डिलीट करने के लिए है, क्या यह आप कर सकते हैं? उन्होंने यूआरएल का ब्योरा दिया है। अदालत ने पूछा कि क्या यदि ऐसा निर्देश दिया जाता है तो यह सभी इस तरह के लिंक्स पर लागू होगा जो सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर मौजूद हैं।
अदालत ने बताने को कहा- किसने पहले किया अपलोड
अदालत ने यह भी पूछा कि इन प्लैटफॉम्स को बताने की आवश्यकता क्यों हैं? वे खुद ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं। हम संस्था के वृहत हित की सोच रहे हैं। गूगल ने कहा कि जैसे ही मंत्रालय से यूआरएल मिलते हैं उन्हें डिलीड कर दिया जाता है। मेटा ने कहा कि किसी वीडियो के आते ही डिलीट नहीं किया जा सकता है। उनकी ओर से कॉन्टेंट को जज नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि अगली बार निर्देश लेकर आएं और यह सूचना दें कि सबसे पहले किसने अपलोड किया। हाई कोर्ट ने कहा कि जो कुछ कानून का उल्लंघन करता है उसे सर्कुलेट किए जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।




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