सोशल मीडिया से सड़क तक, CJP के पहले प्रदर्शन में क्या गड़बड़ हुईं? 5 प्वाइंट में समझिए पूरी कहानी
NEET पेपर लीक और शिक्षा मंत्री धमेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर CJP का पहला बड़ा प्रदर्शन दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ। भीड़ जुटाने में सफलता मिली, लेकिन बदलती प्लानिंग, कमजोर साउंड सिस्टम, वॉलंटियर की कमी, अनुमति संबंधी उलझन और पानी की किल्लत जैसी कमियां भी सामने आईं।

नीट पेपर लीक, सीबीएसई के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में कथित गड़बड़ियों और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धमेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का पहला बड़ा जमीनी प्रदर्शन हुआ। सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रिय हुए इस आंदोलन में सैकड़ों समर्थक शामिल हुए। सीजेपी फाउंडर अभिजीत दीपके ने अमेरिका से दिल्ली पहुंचकर प्रदर्शन की कमान संभाली। हालांकि, भीड़ जुटाने में सफलता मिलने के बावजूद यह प्रदर्शन कई ऐसी कमियों से घिरा रहा, जिसने संगठन की जमीनी तैयारियों पर कई सवाल खड़े कर दिए। तो CJP के पहले प्रदर्शन में क्या-क्या गड़बड़ हुआ? आइए 5 प्वाइंट में पूरी कहानी समझते हैं।
1- समय और जगह बदलने से शुरुआत से ही फैला भ्रम
प्रदर्शन की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी प्लानिंग को लेकर रही। शुरुआत में अभिजीत दीपके ने कहा- शनिवार सुबह दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचें। इसके बाद कार्यक्रम में बदलाव करते हुए लोगों को पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने के बाहर जुटने को कहा। लेकिन प्रदर्शन वाले दिन सुबह फिर नई सूचना जारी कर दी गई- वहां आने की जरूरत नहीं है। आप लोग सीधे जंतर-मंतर पहुंचें।
लगातार बदलती प्लानिंग ने दूर-दराज से आए युवाओं को असमंजस में डाल दिया। कई लोग रातभर ट्रेन से सफर कर सुबह दिल्ली पहुंचे थे, लेकिन उन्हें बार-बार नई जानकारी मिलती रही। किसी भी बड़े आंदोलन में सही और तय कार्यक्रम बेहद जरूरी माना जाता है, लेकिन CJP का पहला बड़ा प्रदर्शन इसी मोर्चे पर कमजोर दिखाई दिया।
2- माइक और साउंड सिस्टम ने बिगाड़ा असर
जंतर-मंतर पहुंचने के बाद प्रदर्शन का दूसरा बड़ा संकट तकनीकी व्यवस्थाओं में दिखाई दिया। अभिजीत दीपके ने समर्थकों को संबोधित करने के लिए हैंड माइक का इस्तेमाल किया, लेकिन भीड़ बढ़ने के साथ उसकी आवाज लोगों तक ठीक से नहीं पहुंच पा रही थी।
स्थिति तब और मुश्किल हो गई जब दिल्ली पुलिस की सार्वजनिक घोषणाएं कई बार भाषण से ज्यादा स्पष्ट सुनाई देने लगीं। कई मौकों पर दीपके की बातें भीड़ के बड़े हिस्से तक पहुंच ही नहीं पाईं। एक जन आंदोलन में भाषण और मेसेज ही भीड़ को एकजुट रखते हैं। ऐसे में कमजोर साउंड सिस्टम ने आंदोलन की ऊर्जा और प्रभाव दोनों को प्रभावित किया।
3- वॉलंटियर की कमी से बिखरी भीड़
प्रदर्शन के दौरान भीड़ प्रबंधन की कमी भी साफ दिखाई दी। पर्याप्त संख्या में वॉलंटियर मौजूद नहीं थे। इस कारण अलग-अलग ग्रुप अपने-अपने स्तर पर नारेबाजी करते रहे। कई बार ऐसा लगा कि प्रदर्शन एक संगठित आंदोलन के बजाय छोटे-छोटे समूहों में बंट गया है।
एक समय ऐसा भी आया जब अभिजीत दीपके मीडिया कर्मियों की भीड़ के बीच फंस गए, जबकि प्रदर्शनकारी आगे बढ़ गए। बाद में स्थिति संभल गई, लेकिन शुरुआती अव्यवस्था ने यह इशारा किया कि संगठन के पास भीड़ को काबू में करने और उसे एक सटीक दिशा देने के लिए पर्याप्त ग्राउंड टीम नहीं थी।
4- आखिरी समय में परमीशन लेने से बढ़ीं मुश्किलें
प्रदर्शन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर भी स्पष्टता की कमी दिखाई दी। आम तौर पर किसी बड़े प्रदर्शन के लिए पुलिस से पहले से अनुमति लेने और समन्वय स्थापित करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। लेकिन रिपोर्टों के अनुसार CJP ने प्रदर्शन की अनुमति से जुड़ी प्रक्रिया अंतिम समय में शुरू की।
इसका असर यह हुआ कि आयोजन को लेकर पुलिस और आयोजकों दोनों के बीच अनिश्चितता बनी रही। प्रदर्शन से एक दिन पहले तक पुलिस अधिकारियों के पास भी सीमित जानकारी थी और वे सोशल मीडिया पर फैल रही जानकारियों के आधार पर तैयारी कर रहे थे। किसी भी बड़े जन आंदोलन के लिए प्रशासनिक तैयारी और कानूनी तैयारियों का समय पर पूरा होना बेहद जरूरी माना जाता है, लेकिन यहां यह पहलू भी कमजोर नजर आया।
5- 40 डिग्री की गर्मी में पानी तक की व्यवस्था नहीं
दिल्ली की भीषण गर्मी ने प्रदर्शनकारियों की परेशानी और बढ़ा दी। तापमान लगभग 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास था, लेकिन बड़ी संख्या में जुटने वाले लोगों के लिए पर्याप्त पानी की व्यवस्था दिखाई नहीं थी। स्थिति यह हो गई कि आसपास की कई दुकानों में बोतलबंद पानी खत्म होने लगा।
कुछ जगहों पर लोग लस्सी खरीदकर प्यास बुझाने को मजबूर दिखे। बाद में पानी का टैंकर पहुंचा, लेकिन तब तक काफी लोग गर्मी और पानी की कमी से जूझ चुके थे। किसी भी लंबे प्रदर्शन में पानी, प्राथमिक चिकित्सा और बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था आयोजकों की प्राथमिक जिम्मेदारी मानी जाती है।
भीड़ जुटी, लेकिन संगठनात्मक क्षमता की परीक्षा बाकी
CJP के लिए यह प्रदर्शन कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा। पहली बार संगठन ने सोशल मीडिया की लोकप्रियता को जमीन पर उतारने की कोशिश की और सैकड़ों लोगों को एक मंच पर जुटाने में सफलता भी हासिल की। लेकिन इस आयोजन ने यह भी दिखाया कि ऑनलाइन समर्थन और जमीनी आंदोलन चलाने में बड़ा अंतर होता है।
सीजेपी को क्या सबक लेने की जरूरत है
कार्यक्रम में लोगों की मौजूदगी ने यह संकेत जरूर दिया कि शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर युवाओं में असंतोष है, लेकिन प्रोटेस्ट के दौरान सामने आई अव्यवस्था ने यह भी साबित किया कि CJP को यदि नेशनल लेवल का आंदोलन खड़ा करना है, तो उसे प्लानिंग, कॉर्डिनेशन, रिसोर्सेज मैनेजमेंट और संगठनात्मक ढांचे को कहीं अधिक मजबूत करना होगा। जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन भीड़ के लिहाज से सफल कहा जा सकता है, लेकिन व्यवस्थाओं के स्तर पर यह CJP के लिए कई अहम सबक छोड़ गया।




साइन इन