‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ को छोड़ सभी विचारों का सम्मान : शीर्ष कोर्ट
नई दिल्ली की शीर्ष अदालत ने धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान 'व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी' से मिलने वाली जानकारियों को अस्वीकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि सभी विचारों का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन निजी राय को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।

नई दिल्ली, एजेंसी। शीर्ष अदालत ने गुरुवार को तथ्यों और जानकारियों की पुष्टता को लेकर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सभी प्रतिष्ठित लेखकों और विचारकों के विचारों का सम्मान करता है, लेकिन ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ से मिलने वाली जानकारियों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। नौ जजों की संविधान पीठ की यह टिप्पणी धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ कई धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और विस्तार पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में सबरीमाला मंदिर का मामला भी शामिल है।
पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं। गुरुवार को पीठ के समक्ष दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रमुख की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने कांग्रेस नेता शशि थरूर द्वारा लिखे एक लेख का जिक्र किया, जिसमें धार्मिक मामलों में न्यायिक संयम बरतने की बात कही गई थी।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘हम सभी जाने-माने लोगों, न्यायविदों आदि का सम्मान करते हैं, लेकिन निजी राय तो निजी राय ही होती है।’ इस पर कौल ने कहा कि अगर ज्ञान किसी भी देश, विश्वविद्यालय या किसी भी स्रोत से मिलता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। कहा कि एक सभ्यता के तौर पर हम इतने समृद्ध हैं कि ज्ञान और जानकारी को सभी रूपों में स्वीकार कर सकते हैं। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘लेकिन व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी पर विचार नहीं किया जा सकता।’ हालांकि, कौल ने इस पर कहा कि वह इस बात पर बहस नहीं कर रहे कि कौन सा विश्वविद्यालय अच्छा है या बुरा। मुख्य बात यह है कि ज्ञान और जानकारी जहां से मिले, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। समाचार लिखे जाने तक सुनवाई जारी थी।प्रथाओं को जरूरी या गैरजरूरी बताना मुश्किलइससे पहले शीर्ष अदालत ने बुधवार को कहा था कि किसी भी न्यायिक मंच के लिए यह तय करने के मापदंड तय करना बहुत मुश्किल (अगर नामुमकिन नहीं तो) है कि किसी धार्मिक संप्रदाय की कोई विशेष प्रथा जरूरी है या गैरजरूरी। बता दें कि सितंबर 2018 में पांच जजों की एक संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से अपने फैसले में उस प्रतिबंध को हटा दिया था, जो 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को सबरीमाला अयप्पा मंदिर में प्रवेश करने से रोकता था। पीठ ने यह भी माना था कि सदियों पुरानी यह प्रथा अवैध और असंवैधानिक थी।
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