हिंदुओं को एकजुट रहने का संदेश क्यों देने लगीं सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना, किस मामले में ऐसी अपील
चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा, संविधान के तहत किसी भी धर्म के किसी खास संप्रदाय की धार्मिक प्रथा तब तक सुरक्षित है, जब तक वे नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ न हों।

Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ ने बुधवार को कहा कि किसी धार्मिक संप्रदाय की किसी खास प्रथा को जरूरी या गैर-जरूरी घोषित करने के लिए कोई एक तय नियम या सार्वभौमिक दिशा-निर्देश बनाना कोर्ट के लिए बहुत मुश्किल है। पीठ ने कहा कि ऐसा इसलिए, क्योंकि हर धर्म की अपनी अनूठी परंपराएं होती हैं। पीठ ने यह भी कहा कि हिंदू समाज को अलग-अलग संप्रदायों में बंटने के बजाय एकजुट होना चाहिए, नहीं तो वह कमजोर हो जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली संविधान पीठ ने कहा कि यदि कोई खास हिंदू धार्मिक संप्रदाय कुछ प्रथाओं का पालन करता है तो उन सभी को जरूरी धार्मिक प्रथाएं नहीं कहा जा सकता, यदि वे नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती हैं।
पीठ ने केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और प्रवेश पर प्रतिबंध से जुड़े मुद्दों पर 7वें दिन की बहस के दौरान यह टिप्पणी की है। पीठ ने कहा, संविधान के तहत किसी भी धर्म के किसी खास संप्रदाय की धार्मिक प्रथा तब तक सुरक्षित है, जब तक वे नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ न हों।
जस्टिस वीबी नागरत्ना ने कहा कि ‘अगल-अलग संप्रदायों में बंटने के बजाय हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे हमारे मंदिर नहीं आ सकते, हम उनके मंदिर में नहीं जा सकते, इस तरह की सोच सही नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि कोई संप्रदाय अपने मंदिर को दूसरों के लिए नहीं खोलता है तो वह कमजोर हो जाएगा।
धर्म की आजादी बहुत जरूरी: गोपाल सुब्रमण्यम
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने पीठ द्वारा पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए कहा, राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारियां जरूरी हैं, पर धर्म व विवेक की आजादी भी जरूरी है। अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत किसी कानून को सख्ती से पढ़ा जाना चाहिए। सुधार की जरूरत और हासिल किए जाने वाले मकसद के बीच एक स्पष्ट जुड़ाव होना चाहिए।




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