Hindu to Hindu hai, kisi bhi mandir men ja sakta hai why Justice Nagarathna said in Sabarimala Reference Hearing case हिन्दू तो हिन्दू है, किसी भी मंदिर में जा सकता है; जस्टिस नागरत्ना ने SC में क्यों कहा ऐसा?, India News in Hindi - Hindustan
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हिन्दू तो हिन्दू है, किसी भी मंदिर में जा सकता है; जस्टिस नागरत्ना ने SC में क्यों कहा ऐसा?

Sabarimala Reference Hearing Day 8 Updates: जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए और मंदिरों को संप्रदाय की रेखाओं पर एक-दूसरों को बाहर नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा अलगाव अंततः संप्रदाय को ही कमजोर करेगा।

Thu, 23 April 2026 02:54 PMPramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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हिन्दू तो हिन्दू है, किसी भी मंदिर में जा सकता है; जस्टिस नागरत्ना ने SC में क्यों कहा ऐसा?

Sabarimala Reference Hearing Day 8 Updates: केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ में आज (गुरुवार, 23 अप्रैल को) आठवें दिन भी सुनवाई जारी है। सुनवाई के दौरान आज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि, “एक हिंदू आखिरकार तो हिंदू ही है और वह किसी भी मंदिर में जा सकता है।” दरअसल, मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली ये संविधान पीठ इस बात पर विचार कर रही है कि क्या धार्मिक संप्रदाय अपने विशिष्ट रीति-रिवाजों के आधार पर दूसरों को मंदिर में प्रवेश से रोक सकते हैं।

इस पीठ में CJI सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। संविधान पीठ न्यायिक समीक्षा के दायरे, अनुच्छेद 25 , 26 और अनुच्छेद 14 के बीच संतुलन ,'संवैधानिक नैतिकता' की भूमिका और धार्मिक मामलों में जनहित याचिकाओं की स्वीकार्यता से संबंधित प्रमुख सवालों की जांच कर रही है।

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हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए और मंदिरों को संप्रदाय की रेखाओं पर एकदूसरों को बाहर नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा अलगाव अंततः संप्रदाय को ही कमजोर करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि दक्षिण भारत में भले ही पूजा के विभिन्न रूप (जैसे शैव या वैष्णव) प्रचलित हों और वे संरक्षित हों, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एक हिंदू दूसरे संप्रदाय के मंदिर में नहीं जा सकता।

एक हिंदू, आखिरकार हिंदू ही होता है

जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा, “कोई भी हिंदू किसी भी मंदिर में जा सकता है। एक तरीका है 'संप्रदाय'... मंदिर शैव, वैष्णव या श्री वैष्णव पूजा पद्धति का पालन करता है। कम से कम दक्षिण भारत में तो ऐसा ही होता है। ये ही वहाँ की प्रचलित प्रथाएँ हैं। इसलिए, इसे एक 'संप्रदाय' कहा जाता है। अब, अगर पूजा की पद्धति शैव प्रकार की है, तो वैष्णव संप्रदाय के लोग यह नहीं कह सकते कि इसे वैष्णव पद्धति के अनुसार ही होना चाहिए; क्योंकि उन दोनों पूजा पद्धतियों में अंतर होता है... इसलिए, पूजा के उस विशिष्ट स्वरूप को संरक्षण प्राप्त है। इसका किसी 'संगठन' के होने या न होने से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसा होना जरूरी नहीं है। एक हिंदू, आखिरकार हिंदू ही होता है। वह किसी भी मंदिर में जा सकता है।”

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'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' और व्यक्तिगत विचार

सुनवाई के दौरान एक रोचक मोड़ तब आया जब वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कांग्रेस नेता शशि थरूर के एक लेख का हवाला दिया। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा कि ज्ञान और ज्ञान के स्रोतों का स्वागत है, लेकिन "व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी" से नहीं। मुख्य न्यायाधीश ने भी इस पर सहमति जताते हुए कहा कि अदालत सभी प्रतिष्ठित व्यक्तियों का सम्मान करती है, लेकिन "व्यक्तिगत राय केवल व्यक्तिगत राय होती है।"

सामाजिक सुधार में राज्य की भूमिका

न्यायालय ने सामाजिक सुधारों के संदर्भ में राज्य की शक्ति पर भी चर्चा की। पीठ ने टिप्पणी की कि राज्य कोई अजनबी या विदेशी संस्था नहीं है, बल्कि वह लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। अगर जनता किसी सामाजिक बुराई को सुधारना चाहती है, तो राज्य के पास उस शक्ति का प्रयोग करने का अधिकार है। जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत सामाजिक सुधार के लिए बनाया गया कानून धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों पर प्रभावी हो सकता है।

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संविधान पीठ के सामने प्रमुख कानूनी प्रश्न क्या हैं?

इस नौ सदस्यीय संविधान पीठ के सामने सात मुख्य प्रश्न हैं, जिनमें शामिल हैं:

-संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा क्या है?

-अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत अधिकार) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदायों के अधिकार) के बीच क्या संबंध है?

-क्या 'नैतिकता' शब्द में 'संवैधानिक नैतिकता' भी शामिल है?

-क्या कोई व्यक्ति जो उस संप्रदाय का हिस्सा नहीं है, जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से उसकी प्रथाओं को चुनौती दे सकता है?

-संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत किसी धार्मिक प्रथा की न्यायिक समीक्षा का दायरा और विस्तार क्या है?

-संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (b) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति "हिंदुओं के वर्ग" का क्या अर्थ है?

दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं कर सकते

वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्णन वेणुगोपाल ने इस मामले के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इस फैसले का असर देश के लगभग 1.5 अरब लोगों पर पड़ेगा और दुनिया भर के संवैधानिक विद्वान इसकी समीक्षा करेंगे। उन्होंने धर्म के मामलों में राज्य के बढ़ते हस्तक्षेप पर भी चिंता व्यक्त की। फिलहाल सुनवाई जारी है और इसका परिणाम भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन को नई दिशा देगा। बुधवार को शीर्ष अदालत ने कहा था कि धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं से उत्पन्न होने वाले मुद्दों पर निर्णय देते समय सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता है लेकिन न्यायालय ने यह संकेत भी दिया कि वह ऐसी प्रथाओं से संबंधित जनहित याचिकाओं के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं कर सकता।