ब्यूरो :: अदालत से :: मस्जिद में महिलाओं को जाने की आजादी है, लेकिन यह जरूरी नहीं : एआईएमपीबी
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड (एआईएमपीबी) ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में जाने की पूरी आजादी है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद ने बताया कि पैगम्बर मोहम्मद ने महिलाओं के मस्जिद आने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने इस पर बहस की और धार्मिक रीति-रिवाजों में न्यायिक दखल पर संयम बरतने का आग्रह किया।

नोट :: पूर्व में जारी ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ को छोड़ सभी विचारों का सम्मान : शीर्ष अदालत’ और ‘महिलाओं के नमाज के लिए मस्जिद आने पर कोई रोक नहीं’ दोनों खबरों को निरस्त कर कृपया इसी खबर का प्रयोग कीजिए। --------------------------------------------------------------प्रभात कुमारनई दिल्ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड (एआईएमपीबी) ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ से कहा कि मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में जाने की पूरी आजादी है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। एआईएमपीबी ने संविधान पीठ से कहा कि पैगम्बर मोहम्मद ने खुद कहा था कि महिलाओं को मस्जिद आने से मत रोको।देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अगुवाई वाली संविधान पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद ने सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और प्रवेश पर रोक से जुड़े मुद्दों पर आठवें दिन की बहस के दौरान यह जानकारी दी।
बता दें कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश की मांग करने वाली रिट याचिकाएं भी सबरीमाला मामले के साथ जोड़ दी गई हैं क्योंकि वहां भी अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे से जुड़े संवैधानिक सवाल उठते हैं। सीजेआई सूर्यकांत के अलावा संविधान पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची भी शामिल हैं।वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने पीठ को ध्यान दिलाया कि एक याचिका में यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि महिलाओं को नमाज के दौरान मस्जिदों में पहली कतार में खड़े होने की इजाजत दी जाए। कहा कि इस तरह की मांग बेमायनी है, क्योंकि मस्जिद के अंदर कोई गर्भगृह नहीं है, तो कोई भी किसी खास जगह पर खड़े होने या नमाज के लिए सबसे आगे रहने की जिद नहीं कर सकता। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने उनसे जानना चाहा कि ‘तथ्यों की स्पष्टता के लिए, क्या महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश करने की अनुमति है?’ इसका जवाब देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने कहा कि ‘इस्लाम के सभी संप्रदायों में इस बात पर आम सहमति है कि महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश करने पर कोई रोक नहीं है। लेकिन इस पर भी सहमति है कि महिलाओं के लिए नमाज पढ़ने वाली जमात का हिस्सा होना जरूरी नहीं है।’जस्टिस अमनुल्लाह ने उनसे इस बारे में और भी विस्तार से बताने के लिए कहा कि ‘इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि महिलाएं प्रवेश कर सकती हैं और यह सिलसिला खुद पैगंबर साहब ने ही शुरू किया था।’ वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने सहमति जताते हुए कहा कि इस पर पूरी स्पष्टता है और जिन लोगों ने कई खंडों में हदीसें संकलित की हैं, उनमें से कई ने यह बात दर्ज की है कि पैगंबर साहब ने निर्देश दिया था कि महिलाओं को मस्जिद आने से न रोका जाए। कहा कि पुरुषों के लिए मस्जिद जाकर जमात (समूह) में नमाज पढ़ना जरूरी है। महिलाएं मस्जिद जा सकती हैं, लेकिन वहां कुछ नियमों का पालन करना जरूरी है। बेहतर यही है कि वह घर पर ही नमाज पढ़े। इससे भी उन्हें उतना ही धार्मिक सवाब (पुण्य) मिलता है। जस्टिस अमनुल्लाह ने कहा कि इसका कारण भी बताइए। हालांकि, फिर उन्होंने खुद ही कहा, ‘इसका कारण यह था कि घर से सभी लोग बाहर चले जाएंगे, तो बच्चों की देखभाल कौन करेगा?’वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने संविधान पीठ से गुजारिश की कि धार्मिक रीति-रिवाजों में न्यायिक दखल में संयम बरता जाए। उन्होंने इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ के मामले में पारित उस फैसले पर सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि इस्लाम के लिए मस्जिद होना जरूरी नहीं है। कहा कि मस्जिद मुस्लिम समुदाय की आस्था का केंद्र है, लेकिन जब यह बात आती है कि मस्जिद जरूरी नहीं है, तो फिर हम अनुच्छेद 25 का क्या करेंगे? इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ‘यह तो ऐसा कहने जैसा है कि मंदिर होना जरूरी नहीं है। यह तय करने का अधिकार कोर्ट को किसने दिया है?’ इस पर अधिवक्ता ने कहा कि ‘बिल्कुल, यही तो बात है।’सेना में दाढ़ी के मुद्दे पर नहीं जाना : सीजेआईवरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने संविधान पीठ के समक्ष उस फैसले का जिक्र किया, जिसमें एक मुस्लिम शख्स को दाढ़ी रखने के कारण सेना से निकालने के फैसले को सही ठहराया गया था। फैसले का आधार यह था कि इस्लाम में दाढ़ी रखना ‘जरूरी’ नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि ‘यदि मेरा सिख भाई दाढ़ी रखकर सेना में शामिल हो सकता है, तो एक मुस्लिम क्यों नहीं?’ इस पर सीजेआई ने कह कि अदालत इस विषय पर बहस में नहीं पड़ेगी। कहा कि सिख धर्म में पुरुषों के लिए दाढ़ी रखना अनिवार्य है और यह उनके पांच अनिवार्य सिद्धांतों में एक है। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने कहा कि कई नियम और कानून देखने में निष्पक्ष लग सकते हैं, लेकिन उनका कुछ वर्गों पर भेदभावपूर्ण असर पड़ सकता है।‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ से मिली जानकारी स्वीकार नहीं : जस्टिस नागरत्नादाऊदी बोहरा समुदाय के प्रमुख की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कांग्रेस नेता शशि थरूर के एक लेख का हवाला दिया, जिसमें धार्मिक राहत से जुड़े मामलों में न्यायिक संयम की बात कही गई थी। इस पर सीजेआई ने कहा कि ‘हम सभी प्रतिष्ठित लेखकों, विधिवेत्ताओं का सम्मान करते हैं, लेकिन निजी राय निजी ही होती है।’ इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि सभी स्रोतों से जानकारी लेने में कोई बुराई नहीं है। हमारी सभ्यता इतनी समृद्ध है कि हम हर प्रकार के ज्ञान और सूचना को स्वीकार कर सकते हैं। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि ‘लेकिन व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से नहीं।’ इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, ‘मैं इस बहस में नहीं जा रहा कि कौन-सा विश्वविद्यालय अच्छा है या बुरा, क्योंकि यह इस बहस के लिए अप्रासंगिक है। मुद्दा सिर्फ इतना है कि जहां से भी ज्ञान और सूचना मिले, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए।’
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