AIMPB Advocates Women s Right to Enter Mosques Supreme Court Deliberates सबरीमाला: मस्जिद में महिलाओं को जाने की आजादी है, लेकिन यह जरूरी नहीं- एआईएमपीबी, Delhi Hindi News - Hindustan
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सबरीमाला: मस्जिद में महिलाओं को जाने की आजादी है, लेकिन यह जरूरी नहीं- एआईएमपीबी

प्रभात कुमार नई दिल्ली। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड (एआईएमपीबी) ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट

Thu, 23 April 2026 08:23 PMNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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सबरीमाला: मस्जिद में महिलाओं को जाने की आजादी है, लेकिन यह जरूरी नहीं- एआईएमपीबी

प्रभात कुमार नई दिल्ली।ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड (एआईएमपीबी) ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ से कहा कि मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में जाने की पूरी आजादी है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। एआईएमपीबी ने संविधान पीठ से कहा कि पैगम्बर मोहम्मद ने खुद कहा था कि महिलाओं को मस्जिद आने से मत रोको।देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अगुवाई वाली 9 जजों की संविधान पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद ने सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और प्रवेश पर रोक से जुड़े मुद्दों पर 8वें दिन की बहस के दौरान यह जानकारी दी।

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मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश की मांग करने वाली रिट याचिकाएं भी सबरीमाला मामले के साथ जोड़ दी गई हैं क्योंकि वहां भी अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे से जुड़े संवैधानिक सवाल उठते हैं। सीजेआई सूर्यकांत के अलावा संविधान पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची भी शामिल है।एआईएमपीबी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने कहा कि ‘महिलाओं को मस्जिदों में जाने की पूरी आजादी है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।’ अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने पीठ को ध्यान दिलाया कि एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि महिलाओं को नमाज के दौरान मस्जिदों में पहली कतार में खड़े होने की इजाजत दी जाए। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि इस तरह की मांग करना बेमानी हैं क्योंकि ये इस बात को पहले से मानकर चलते हैं कि मस्जिदों में कोई ‘गर्भगृह’ (किसी धार्मिक स्थल का सबसे पवित्र हिस्सा) होता है। उन्होंने कहा कि यदि मस्जिद के अंदर कोई गर्भगृह नहीं है, तो कोई भी किसी खास जगह पर खड़े होने की, या फिर नमाज की इमामत करने में सबसे आगे रहने की जिद नहीं कर सकता। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने उनसे जानना चाहाा कि ‘तथ्यों की स्पष्टता के लिए, क्या महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश करने की अनुमति है?’इसका जवाब देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने कहा कि ‘इस्लाम के सभी संप्रदायों में इस बात पर आम सहमति है कि महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश करने पर कोई रोक नहीं है। लेकिन इस बात पर भी सहमति है कि महिलाओं के लिए नमाज पढ़ने वाली जमात का हिस्सा होना जरूरी नहीं है।’ तब जस्टिस अमनुल्लाह ने उनसे इस बारे में और भी विस्तार से बताने के लिए कहा कि ‘इस बात पर कोई विवाद नहीं है (कि महिलाएं प्रवेश कर सकती हैं) और यह सिलसिला खुद पैगंबर साहब ने ही शुरू किया था।’वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने सहमति जाहिर करते हुए संविधान पीठ से कहा कि पैगंबर मोहम्मद साहब ने खुद कहा था कि महिलाओं को मस्जिद आने से मत रोको। इस पर पूरी स्पष्टता है और जिन लोगों ने कई खंडों में हदीसें संकलित की हैं, उनमें से कई ने यह बात दर्ज की है कि पैगंबर साहब ने निर्देश दिया था कि महिलाओं को मस्जिद आने से न रोका जाए। उन्होंने कहा कि पुरुषों के लिए जमात का हिस्सा बनना अनिवार्य है, जबकि महिलाओं के लिए यह अनिवार्य नहीं है। उन्होंने संविधान पीठ से कहा कि जहां पुरुषों के लिए मस्जिद जाकर जमात (समूह) में नमाज पढ़ना जरूरी है, वहीं महिलाएं घर पर भी नमाज पढ़ सकती हैं और उन्हें उतना ही धार्मिक सवाब (पुण्य) मिलता है। एआईएमपीबी की ओर से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि ‘वे (महिलाएं) मस्जिद में जा सकती हैं, लेकिन वहां कुछ नियमों का पालन करना जरूरी है। पैगंबर मोहम्मद ने खुद कहा था कि महिलाओं को मस्जिद आने से मत रोको। लेकिन साथ ही, सभी संप्रदायों में इस बात पर आम सहमति है कि नमाज पढ़ने के लिए महिलाओं का जमात का हिस्सा होना जरूरी नहीं है। एक महिला नमाज पढ़ने के लिए पूरी तरह आजाद है, और बेहतर यही है कि वह घर पर ही नमाज पढ़े।’ संविधान पीठ में शामिल जस्टिस अमनुल्लाह ने इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद से कहा कि ‘इसका कारण भी बताइए। फिर उन्होंने खुद ही कहा कि इसका कारण यह था कि अगर घर से सभी लोग बाहर चले जाएंगे, तो बच्चों की देखभाल कौन करेगा?’वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने संविधान पीठ से यह गुजरिश की कि धार्मिक रीति-रिवाजों में न्यायिक दखल के मामले में संयम बरता जाना चाहिए। उन्होंने इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ के मामले में पारित उस फैसले पर सवाल उठाया, जिसमें यह कहा गया था कि इस्लाम धर्म के लिए मस्जिद का होना जरूरी नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता से पीठ से कहा कि ‘मुद्दा यह नहीं था कि मस्जिद जरूरी है या नहीं। जब बहुमत का फैसला आया, तो उसमें कहा गया कि चूंकि नमाज खुले में भी पढ़ी जा सकती है, इसलिए मस्जिद का होना जरूरी नहीं है। यह पैमाना पूरी तरह से गलत है। कई फैसलों में इसी पैमाने का इस्तेमाल किया गया है... मस्जिद मुसलमानों की आस्था का मूल केंद्र है। सभी धार्मिक रीति-रिवाज आखिरकार मस्जिद से ही जुड़े होते हैं। लेकिन जब हमारे सामने यह बात आती है कि मस्जिद ज़रूरी नहीं है, तो फिर हम अनुच्छेद 25 का क्या करेंगे?’ इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ‘यह तो बिल्कुल ऐसा कहने जैसा है कि मंदिर का होना जरूरी नहीं है। यह तय करने का अधिकार कोर्ट को किसने दिया है?’ इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने कहा कि ‘बिल्कुल। यही तो बात है।’दाढ़ी वाले सिख सेना में हो सकते हैं तो मुस्लिम क्यों नहीं के मुद्दे पर नहीं जाना- सीजेआईवरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद ने संविधान पीठ के समक्ष उस फैसले का जिक्र किया, जिसमें एक मुस्लिम व्यक्ति को दाढ़ी रखने के कारण सेना से निकालने के फैसले को सही ठहराया गया था। उक्त फैसले का आधार यह था कि इस्लाम में दाढ़ी रखना ‘जरूरी’ नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि ‘यदि मेरा सिख भाई दाढ़ी रखकर सेना में शामिल हो सकता है, तो एक मुस्लिम क्यों नहीं?’ इस पर सीजेआई ने कह कि अदालत इस विषय पर किसी बहस में नहीं पड़ेगी। उन्होंने आगे कहा कि सिख धर्म में पुरुषों के लिए दाढ़ी रखना स्पष्ट रूप से अनिवार्य है और यह उनके 5 अनिवार्य सिद्धांतों में से एक है। वरिष्ठ अधिवक्ता शमशाद ने कहा कि कई नियम और कानून, जो देखने में तो निष्पक्ष लग सकते हैं, लेकिन उनका कुछ वर्गों पर भेदभावपूर्ण असर पड़ सकता है।व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी' से मिली जानकारी स्वीकार नहीं- जस्टिस नागरत्नासंविधान पीठ ने कहा कि वह सभी प्रतिष्ठित लेखकों के विचारों का सम्मान करता है, लेकिन वह व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से मिली जानकारी स्वीकार नहीं की जा सकती है। पीठ ने यह टिप्पणी तब की, जब दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रमुख की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कांग्रेस नेता शशि थरूर द्वारा लिखे गए एक लेख का हवाला दिया, जिसमें धार्मिक राहत से जुड़े मामलों में न्यायिक संयम की बात कही गई थी। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि ‘हम सभी प्रतिष्ठित लेखकों, विधिवेत्ताओं आदि का सम्मान करते हैं, लेकिन व्यक्तिगत राय, व्यक्तिगत राय ही होती है।’ इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि सभी स्रोतों से जानकारी लेने में कोई बुराई नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि ज्ञान और बुद्धिमत्ता किसी भी स्रोत, किसी भी देश, किसी भी विश्वविद्यालय से आती है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। हमारी सभ्यता इतनी समृद्ध है कि हम हर प्रकार के ज्ञान और सूचना को स्वीकार कर सकते हैं। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि ‘लेकिन व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से नहीं।’ हालांकि इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता कौल ने कहा कि वह इस बहस में नहीं पड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि ‘मैं इस बहस में नहीं जा रहा कि कौन-सा विश्वविद्यालय अच्छा है या बुरा, क्योंकि यह इस बहस के लिए अप्रासंगिक है... मुद्दा सिर्फ इतना है कि जहां से भी ज्ञान और सूचना मिले, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए।’

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