झारखंड के ध्यानार्थ::अपडेट:1::यूसीसी से आदिवासियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा: अमित शाह
अपडेट:1::आदिवासियों के लिए जंगल, पहाड़ और जल स्रोत आस्था के केंद्र: अमित शाह--शीर्षक से पूर्व

अपडेट:1::आदिवासियों के लिए जंगल, पहाड़ और जल स्रोत आस्था के केंद्र: अमित शाह--शीर्षक से पूर्व में जारी खबर इसी में समाहित कर दी गई है। इसी कॉपी का उपयोग करें आदिवासी समुदाय से साजिशों का शिकार न होने की अपीलदिल्ली में जनजाति सांस्कृतिक समागम में बोले शाहनई दिल्ली, एजेंसी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को कहा कि प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) से आदिवासियों पर किसी भी तरह का कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने समुदाय से अपील की कि वे इस मुद्दे पर फैलाई जा रही साजिशों और गलत जानकारियों का शिकार न बनें।शाह दिल्ली के लाल किला मैदान में बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के मौके पर 'जनजाति सुरक्षा मंच' द्वारा आयोजित 'जनजाति सांस्कृतिक समागम'को संबोधित कर रहे थे।कोई
प्रावधान थोपा नहीं जाएगाशाह ने कहा, अब एक साजिश शुरू हो गई है, जिसमें यह दावा किया जा रहा है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड आदिवासी समुदायों को उनकी संस्कृति, परंपराओं और अपने रीति-रिवाजों के अनुसार जीने के अधिकार से वंचित कर देगा।उन्होंने कहा, आज, इस मंच से गृह मंत्री के तौर पर, मैं यह बिल्कुल साफ कर देना चाहता हूं कि यूसीसी का कोई भी प्रावधान आदिवासी समुदायों या वनवासी समाज पर थोपा नहीं जाएगा।हमने आदिवासियों को बाहर रखाशाह ने कहा कि जहां भी भाजपा सरकारों (राज्यों में) ने यूसीसी लागू किया है, नरेंद्र मोदी सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि सभी आदिवासी समुदाय इसके दायरे से बाहर रहें।गृह मंत्री ने आदिवासी समुदायों से अपील की कि वे प्रस्तावित कानून से न डरें और लोगों से आग्रह किया कि वे गांवों और जंगलों वाले इलाकों में जागरूकता फैलाएं। उन्होंने कहा, मैं उन सभी लोगों से कहना चाहता हूं जो भ्रम फैला रहे हैं कि यूसीसी किसी भी आदिवासी या वनवासी भाई-बहन की परंपराओं और रीति-रिवाजों में कोई दखल नहीं देगा।शाह ने आगे कहा, इस संदेश को हर गांव, हर इलाके, पहाड़ों और जंगलों तक पहुंचाएं और हर आदिवासी समुदाय को जागरूक करें कि यूसीसी से डरने की कोई जरूरत नहीं है।हिंसा के कारण आदिवासियों का विकास रुका रहानक्सलवाद का जिक्र करते हुए शाह ने कहा कि देश इस समस्या से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने दावा किया कि हिंसा के कारण दशकों तक आदिवासियों का विकास रुका रहा है।शाह ने कहा, जिन लोगों ने हिंसा के जरिए आदिवासी समाज के विकास को रोका, उन्होंने हजारों आदिवासियों की जान ले ली। अब हम उस संकट से पूरी तरह बाहर निकल रहे हैं। अब आदिवासी इलाकों, पहाड़ों और जंगलों में तेजी से विकास का समय आ गया है।जबरदस्ती कोई धर्म परिवर्तन नहीं करा सकतागृह मंत्री ने प्रत्येक व्यक्ति के अपनी आस्था का सम्मान के साथ पालन करने के संवैधानिक अधिकार को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि धर्म परिवर्तन लालच, प्रलोभन या जबरदस्ती नहीं किया जाना चाहिए। हमारे संविधान निर्माताओं ने हर व्यक्ति को अपने मूल धर्म में आत्म-सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिया है। कोई भी व्यक्ति लालच, प्रलोभन या जबरदस्ती से किसी का धर्म परिवर्तन नहीं करवा सकता। और मेरा मानना है कि अगर आज यहां इकट्ठा हुआ जनजातीय समुदाय (वनवासी कुंभ) यह संकल्प ले कि हमारा धर्म चाहे जो भी हो, हम जनजातीय समुदायों की विभिन्न मान्यताओं के अनुसार ही अपना जीवन जीते रहेंगे, तो यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा। उन्होंने कहा, जो लोग फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि आदिवासी समुदायों का आज का यह जमावड़ा उन्हें एक बहुत ही कड़ा संदेश देता है। आदिवासी समुदाय प्रकृति पूजा और पारंपरिक मान्यताओं से गहराई से जुड़े रहे हैं।आदिवासी कल्याण पर पिछली सरकारों पर निशानाशाह ने आदिवासी कल्याण पर खर्च को लेकर पिछली कांग्रेस सरकारों पर भी निशाना साधा और दावा किया कि मोदी सरकार ने इस समुदाय के लिए बजट में काफी बढ़ोतरी की है। उन्होंने कहा, पहले, आदिवासी कल्याण के लिए कुल बजट सिर्फ 28000 करोड़ रुपये था। नरेंद्र मोदी जी ने इसे बढ़ाकर 1.54 लाख करोड़ रुपये कर दिया है।जंगल, पहाड़ और जल स्रोत आस्था के केंद्रअमित शाह ने रविवार को कहा कि आदिवासी महानायक बिरसा मुंडा ने पूरे देश में आदिवासी समुदायों के बीच आस्था, जंगलों और पहचान की रक्षा का संदेश फैलाया था। उनके 'उलगुलान' आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी थी। उन्होंने कहा कि जंगल, पहाड़ और जल स्रोत आदिवासी समुदायों की आस्था, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान के केंद्र हैं।उस समय, किसी भी संचार सुविधा के अभाव के बावजूद भगवान बिरसा मुंडा ने झारखंड से गुजरात तक और पूरे भारत में आदिवासी समुदायों के बीच यह संदेश फैलाया कि यह हमारा देश है, हमारा धर्म ही सच्चा धर्म है, और कोई भी हमारे जंगलों पर कब्जा नहीं कर सकता।जनजातीय संस्कृति और सांस्कृतिक विविधता से रूबरू हुए दिल्लीवासीनई दिल्ली, वरिष्ठ संवाददाता। पारंपरिक वेशभूषा, वाद्य यंत्र और लोक गीतों पर नृत्य करते हुए दूर दराज से आए लोग रविवार को अजमेरी गेट से लाल किला परिसर की ओर जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे दिल्लीवासी समृद्ध जनजातीय संस्कृति से रूबरू हो रहे थे। कहीं शहनाई की मधुर धुन गूंज रही थी तो कहीं ढोल-नगाड़ों की थाप वातावरण को उत्सवमय बना रही थी। बैंड-बाजों और लोक कलाकारों की मनमोहक प्रस्तुतियां लोगों का मन मोह रही थीं।जनजाति सांस्कृतिक समागम में हर ओर आस्था, संस्कृति और परंपरा का संगम दिखा। स्थानीय लोग अलग-अलग मार्गों में उत्साह के साथ अलग-अलग राज्यों से आए लोगों का पुष्पवर्षा कर स्वागत कर रहे थे। ड्रोन से भी लोगों पर पुष्पवर्षा की गई। सांस्कृतिक शोभा यात्रा से सभी अभिभूत दिखे। देश के विभिन्न राज्यों से आए वनवासी समाज के लोग पहली बार अपने वन क्षेत्रों से बाहर निकलकर दिल्ली में विशाल सांस्कृतिक शोभा यात्राओं में शामिल हुए।अजमेरी गेट चौक से शुरू हुई शोभा यात्रा को सांसद प्रवीन खंडेलवाल और रामवीर सिंह बिधूड़ी ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। लोग भारतीय लोक संस्कृति, नृत्य, संगीत और उत्सव की जीवंत झलक से उत्साहित नजर आए। जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा आयोजित कार्यक्रम में जनजातीय पहचान, स्वदेशी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव नजर आया। पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे जनजातीय लोगों की रंगारंग सांस्कृतिक शोभायात्रा ने सभी को मंत्रमुग्ध किया। पांच अलग-अलग स्थानों राजघाट चौक, रामलीला मैदान, अजमेरी गेट चौक, कुदसिया बाग (कश्मीरी गेट), श्यामगिरि मंदिर (शास्त्री पार्क बस डिपो के पास) से यह यात्रा शुरू होकर लाल किले पर बने मुख्य स्थल पर एकत्रित हुई।
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