जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अवमानना कार्रवाई के बाद अब क्या करेंगे केजरीवाल? AAP नेताओं के पास ये विकल्प
दिल्ली शराब घोटाला मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ नेअरविंद केजरीवाल समेत अन्य के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया है। कार्यवाही शुरू किए जाने के बाद अब नजर इस बात पर है कि आगे कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ेगी। जानिए अब आगे क्या हो सकता है।

दिल्ली शराब घोटाला मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने गुरुवार, 14 मई को अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज, विनय मिश्रा और दुर्गेश के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया है। मामला कथित तौर पर अदालत की कार्यवाही और जांच एजेंसियों को लेकर सोशल मीडिया पोस्ट एवं सार्वजनिक बयानों से जुड़ा है।
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू किए जाने के बाद अब नजर इस बात पर है कि आगे कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ेगी। कानूनी जानकारों का मानना है कि मामले में संबंधित नेताओं के पास अदालत के सामने अपना पक्ष रखने से लेकर बिना शर्त माफी मांगने और जरूरत पड़ने पर ऊपरी अदालत में अपील करने तक कई विकल्प मौजूद हैं। जानिए अब आगे क्या हो सकता है।
अब आगे क्या हो सकता है?
- पहला विकल्प
कानूनी प्रक्रिया के तहत सबसे पहले संबंधित नेताओं को अदालत में अपना जवाब दाखिल करना होगा। वे यह तर्क दे सकते हैं कि उनकी टिप्पणियां अदालत की अवमानना की श्रेणी में नहीं आतीं या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में थीं। यदि अदालत इन दलीलों से संतुष्ट नहीं होती है, तो मामले में आगे सुनवाई हो सकती है।
- दूसरा विकल्प
दूसरा विकल्प बिना शर्त माफी का माना जाता है। भारतीय न्यायपालिका में पहले भी कई मामलों में अदालतें बिना शर्त माफी स्वीकार कर कार्यवाही समाप्त कर चुकी हैं, हालांकि यह पूरी तरह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है।
- तीसरा विकल्प
तीसरा विकल्प यह है कि यदि हाईकोर्ट की ओर से कोई प्रतिकूल आदेश आता है, तो संबंधित नेता सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार अवमानना मामलों में अपील का रास्ता खुला रहता है।
आप नेताओं से जुड़े अवमानना मामले में कोर्ट ने क्या कहा
अदालत के मुताबिक, इन नेताओं ने अदालती आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के बजाय सोशल मीडिया पर भ्रामक वीडियो और लेटर के जरिए न्यायपालिका के खिलाफ दुष्प्रचार किया है। जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि यह निजी हमला नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्था को डराने की कोशिश थी। इसे नहीं रोकने पर अराजकता फैल सकती है। कोर्ट ने कहा, किसी जज की आलोचना अपराध नहीं है, लेकिन दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाना और जजों को धमकाना गंभीर अवमानना है।
जब प्रशांत भूषण पर अवमानना में लगा 1 रुपये का जुर्माना
भारतीय राजनीति और न्यायपालिका में अवमानना से जुड़े मामले पहले भी चर्चा में रहे हैं। वरिष्ठ वकील और पूर्व कानून मंत्री प्रशांत भूषण के खिलाफ 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना मामले में कार्रवाई की थी। उस मामले में अदालत ने उनके ट्वीट्स को न्यायपालिका की गरिमा से जुड़ा मुद्दा माना था।
हालांकि सजा के समय अदालत ने उन्हें केवल एक रुपये का जुर्माना लगाया था। कोर्ट ने कहा था कि जुर्माना नहीं देने पर उन्हें तीन महीने की जेल और तीन साल तक वकालत करने से रोकने जैसी कार्रवाई हो सकती है। बाद में प्रशांत भूषण ने एक रुपये का जुर्माना जमा कर दिया और मामला वहीं समाप्त हो गया।
अवमानना क्या होती है?
अगर कोई व्यक्ति अदालत, जज या न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को नुकसान पहुंचाने वाली टिप्पणी, बयान या कार्रवाई करता है, तो उसे अदालत की अवमानना माना जा सकता है। Contempt of Courts Act, 1971 के तहत अदालत को यह अधिकार है कि वह ऐसी गतिविधियों पर कार्रवाई करे, जो न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करें या अदालत की प्रतिष्ठा कम करने की कोशिश मानी जाएं। दोष साबित होने पर अदालत जुर्माना, माफी स्वीकार करने या अधिकतम छह महीने की जेल जैसी सजा दे सकती है।




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