Jamiat chief says, Flexible policy of Congress on religion-based politics damaged country ..तो देश बर्बादी की कगार पर नहीं पहुंचता; कांग्रेस पर क्यों खूब बरसे जमीअत उलमा-ए-हिंद के अरशद मदनी, Ncr Hindi News - Hindustan
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..तो देश बर्बादी की कगार पर नहीं पहुंचता; कांग्रेस पर क्यों खूब बरसे जमीअत उलमा-ए-हिंद के अरशद मदनी

अरशद मदनी ने कहा, 'हमारी नजर में महात्मा गांधी जैसे महान व्यक्ति की हत्या, देश की धर्मनिरपेक्षता की हत्या थी, मगर अफसोस उस समय कांग्रेसी नेतृत्व को जो करना चाहिए था वह उसने नहीं किया।'

Wed, 14 Jan 2026 06:24 PMSourabh Jain पीटीआई, नई दिल्ली
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..तो देश बर्बादी की कगार पर नहीं पहुंचता; कांग्रेस पर क्यों खूब बरसे जमीअत उलमा-ए-हिंद के अरशद मदनी

जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष सैय्यद मौलाना अरशद मदनी बुधवार को कांग्रेस पर जमकर बरसे। उन्होंने कांग्रेस पर धर्म पर आधारित राजनीति को लेकर लचीला रुख अपनाने का आरोप लगाया और दावा किया कि अगर पार्टी ने 77 साल पहले सांप्रदायिकता के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया होता, तो वह सत्ता से बाहर नहीं होती और देश बर्बादी की कगार पर नहीं पहुंचता। उन्होंने कहा कि ना जाने किस डर से कांग्रेस नेताओं ने शुरू से ही धर्म आधारित नफरत की राजनीति के खिलाफ नरम और लचीला रुख अपनाया। मदनी ने यह भी कहा कि कांग्रेस ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद अगर सांप्रदायिकता का सिर सख़्ती से कुचल दिया होता तो देश तबाह होने से बच जाता।

'कांग्रेस ने नफरत की राजनीति पर लचीली नीति अपनाई'

बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर की एक पोस्ट में मदनी ने लिखा, 'आजादी के बाद कांग्रेस ने अपने शासन काल में धर्म के आधार पर नफरत की राजनीति पर जो लचकदार नीति अपनाई उसने देश और संविधान दोनों को बड़ा नुकसान पहुंचाया। आज जिस तरह संविधान और लोकतांत्रिक चरित्रों को खुले तौर पर मिटाया जा रहा है इसकी कल्पना आजादी के हमारे पूर्वजों ने कभी नहीं की होगी, जिन रेखाओं पर आजाद भारत के संविधान की नींव रखी गई अगर इन्हीं रेखाओं पर संविधान को भी पूरी ईमानदारी के साथ लागू कर दिया जाता तो आज हमें यह दिन न देखने पड़ते।'

'कांग्रेस नेताओं को ना जाने किस बात का डर था'

आगे उन्होंने लिखा, 'ऐतिहासिक रूप से यह एक दुखद सत्य है कि कांग्रेस के नेताओं ने न जाने किस भय से पहले दिन से धर्म के आधार पर नफरत की राजनीति के विरोध में एक लचकदार नीति अपनाई, सांप्रदायिक शक्तियों के साथ नरमी बरती गई, संविधान के अनुसार उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई से बचा गया, जिसके नतीजे में सांप्रदायिक शक्तियों को खूब फलने फूलने का अवसर मिला।'

'..तो देश को तबाही से बचाया जा सकता था'

जमीयत के अध्यक्ष ने आगे कहा, 'महात्मा गांधी की हत्या के पीछे सांप्रदायिक शक्तियों का हाथ था, अगर उसी समय सांप्रदायिकता के सिर को कुचल दिया जाता तो देश को तबाही से बचाया जा सकता था, विभाजन के बाद देश भर में जब मुस्लिम विरोधी दंगे शुरू हुए तो उन्हें रोकने के लिए महात्मा गांधी ने उपवास रखा, सांप्रदायिक शक्तियां यहां तक कि कांग्रेस में मौजूद कुछ बड़े नेताओं को यह बात अच्छी नहीं लगी, वह उनके खिलाफ हो गए, अंततः उन्हें क़त्ल कर दिया गया।'

मदनी बोले- हमने लिया था सेक्युलर संविधान का आश्वासन

मदनी ने कहा, 'जमीअत उलमा-ए-हिंद का नेतृत्व लगातार कांग्रेसी नेतृत्व से यह मांग कर रही थी कि सांप्रदायिकता के इस जुनून को रोकिए, मगर अफसोस इस मांग पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, जिससे सांप्रदायिक शक्तियों को बढ़ावा मिल गया। आज की पीढ़ी उस इतिहास से भी अनभिज्ञ है कि आजादी से पहले ही जमीअत उलमा-ए-हिंद ने कांग्रेसी नेताओं से एक लिखित आश्वासन ले लिया था कि आजादी के बाद देश का संविधान सेक्युलर होगा, जिसमें सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों को पूर्ण धार्मिक आजादी होगी।'

'कांग्रेस चाहती तो कड़ा कानून बना सकती थी'

आगे मदनी ने बताया, 'जमीअत उलमा-ए-हिंद की जिद के बाद एक सेक्युलर संविधान तैयार हुआ लेकिन सांप्रदायिकता की जड़ें अंदर ही अंदर गहरी होती गईं। जमीअत के लगातार कहने के बाद भी इस पर नकेल नहीं कसी गई जबकि उस समय केंद्र और सभी राज्यों में कांग्रेस की ही सरकार थी, अगर वह चाहती तो उसके खिलाफ कड़ा कानून बन सकता था, मगर उसने जो लचकदार नीति अपनाई थी उसके नतीजे में सांप्रदायिक ताकतें और शक्तिशाली होती गईं।'

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अपनी पोस्ट के अंत में मदनी ने लिखा, 'अगर कांग्रेस ने 77 साल पहले सांप्रदायिकता के खिलाफ यही कड़ा रुख अपनाया होता, तो वह सत्ता से बाहर नहीं होती और देश बर्बादी की कगार पर नहीं पहुंचता।'

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