दिल्ली वालों की जान की कीमत समझी जाए; ठेकेदारों की अग्रिम जमानत खारिज करते हुए HC ने कही बड़ी बात
पीठ ने कहा कि नियमों का हर तरह से उल्लंघन करते हुए वहां पर लगभग 20 फीट लंबा, 13 फीट चौड़ा व 14 फीट गहरा गड्ढा खेादा गया था। वहां कोई बैरिकेड या सुरक्षा उपाय नहीं किए गए थे, तो ऐसे में एक अप्रिय घटना तो होनी ही थी।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को जनकपुरी में एक गड्ढे में गिरे 25 साल के बाइक सवार युवक की मौत के मामले में दो ठेकेदारों को अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया। उच्च न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक सड़कों को मौत का जाल नहीं बनने दिया जा सकता। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अब समय आ गया है कि दिल्ली के लोगों को हल्के में ना लिया जाए और उनकी जान की कीमत समझी जाए।
'ठेकेदारों की जिम्मेदारी थी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना'
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने कहा कि सड़क बनाने के ठेके के अनुसार हिमांशु गुप्ता व कविश गुप्ता की ड्यूटी थी कि वे साइट पर पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करें, जिसमें किसी व्यक्ति या गाड़ी के गड्ढे में गिरने पर जरूरी बचाव उपकरण उपलब्ध कराना, फर्स्ट एड की सुविधा देना, पुलिस व मेडिकल अधिकारियों को तुरंत सूचित करना शामिल है।
'नियमों का उल्लंघन कर खोदा गया था वहां पर गड्ढा'
पीठ ने कहा कि आरोपी ठेकेदारों द्वारा काम की अनुमति की शर्तों, टेंडर की शर्तों व ट्रैफिक पुलिस की शर्तों का पूरी तरह से उल्लंघन करते हुए वहां पर लगभग 20 फीट लंबा, 13 फीट चौड़ा व 14 फीट गहरा गड्ढा खेादा गया था। वहां कोई बैरिकेड या सुरक्षा उपाय नहीं किए गए थे, तो ऐसे में एक अप्रिय घटना तो होनी ही थी।
'दिल्ली के लोगों की जान की कीमत समझी जाए'
पीठ ने कहा कि अब समय आ गया है कि दिल्ली के लोगों को हल्के में न लिया जाए। उनकी जान की कीमत समझी जाए। अभी जैसी घटनाओं को सिर्फ ठेके की शर्तों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। पीठ ने कहा कि सभी लोगों को यह संदेश जाना चाहिए कि जिस व्यक्ति या संस्था को ठेका मिला है। उसे जिम्मेदारी से काम करना होगा अन्यथा कानून के शिकंजे से उन्हें कोई नहीं बचा सकता।
गड्ढे में गिरकर हो गई थी युवक की मौत
बता दें कि शहर के रोहिणी इलाके के जनकपुरी में हुई इस घटना में एक निजी बैंक में काम करने वाले 25 साल के कर्मचारी कमल ध्यानी की 5 और 6 फरवरी की दरमियानी रात को मोटरसाइकिल गड्ढे में गिरने से मौत हो गई थी। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि घटना के बाद दो आरोपियों व उनके सब-कॉन्ट्रैक्टर ने खुद को बचाने की जो साफ कोशिश की, उससे अदालत हैरान रह गई, क्योंकि सबूतों से पता चला कि उन्होंने पीड़ित की मदद करने के बजाय मौके पर जल्दी-जल्दी साइनेज और बैरिकेड्स लगा दिए थे।




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