थानों में रजिस्टरों का ढेर अब पुरानी बात, दिल्ली पुलिस हुई हाई-टेक; ऐप से हो रहे सारे काम
दिल्ली पुलिस ने बीट पुलिसिंग को डिजिटल करते हुए 'ई-बीटबुक' ऐप अपना लिया है। अब अपराधियों का डेटाबेस, किरायेदारों का वेरिफिकेशन और मुखबिरों से संपर्क स्मार्टफोन के जरिए पलक झपकते ही हो रहा है।

क्या आपको वो पुरानी फिल्मों वाले पुलिस कांस्टेबल याद हैं जो हाथ में मोटा रजिस्टर और डंडा लेकर घूमते थे? दिल्ली पुलिस ने अब उस छवि को पीछे छोड़ दिया है। 2026 आते-आते दिल्ली की बीट पुलिसिंग का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है। अब पुलिसवालों के हाथ में रजिस्टर नहीं, बल्कि स्मार्टफोन्स और 'ई-बीटबुक' हैं।
कागज से डिजिटल स्क्रीन तक का सफर
टीओआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, अब दिल्ली पुलिस में ज्यादातर काम ऑनलाइन ही होता है। अब मोटे रजिस्टर मैंटेन नहीं करने पड़ते। सारा डेटा डिजिटल रूप में रिकॉर्ड किया जाता है। पहले पुलिस थानों में फाइलों का ढेर और हाथ से लिखी एफआईआर रहती थीं। एक इलाका बदलने पर सारी जानकारी और मुखबिरों का नेटवर्क फिर से जीरो से बनाना पड़ता था। लेकिन अब नजारा बदल गया है। आज बीट पुलिसिंग कागज और याददाश्त के भरोसे नहीं, बल्कि एप्स और डेटाबेस पर चल रही है।
ई-बीटबुक' का कमाल
अब दिल्ली पुलिस के जवान 'ई-बीटबुक' एप्लीकेशन का इस्तेमाल करते हैं। जब किसी अफसर की बीट बदलती है,यानी ट्रांसफर होता है या इलाका बदलता है, तो ऐप के जरिए स्कूल, कॉलेज, और सीनियर सिटिजन से जुड़ी सारी जानकारी नए अफसर को तुरंत ट्रांसफर हो जाती है। इस ऐप में इलाके के संदिग्धों और बेघर लोगों का पूरा डेटाबेस तैयार रहता है।

मुखबिर हुए डिजिटल, लाउडस्पीकर की जगह सोशल मीडिया
इसके अलावा अब अपराधियों को पकड़ने के तरीके भी अब हाई-टेक हो गए हैं। पहले मुखबिरों से मिलने के लिए उनका पीछा करना पड़ता था या गार्ड्स के जरिए संदेश भेजने पड़ते थे। अब सोशल मीडिया के जरिए मुखबिरों से गुप्त रूप से संपर्क किया जाता है। पहले जहां लाउडस्पीकर से ऐलान होता था, अब रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) और मार्केट के व्हाट्सएप ग्रुप्स के जरिए पुलिस हजारों लोगों से एक साथ जुड़ती है।
किरायेदार का वेरिफिकेशन अब चुटकियों में
आम जनता के लिए भी राहत की खबर है। अब नौकरों या किरायेदारों का वेरिफिकेशन बहुत आसान हो गया है। पुलिस ऐप के जरिए उनकी जानकारी सीधे उनके गृह राज्य के थाने में भेज देती है, जिससे बैकग्राउंड चेक तेजी से हो जाता है। पार्किंग अटेंडेंट और कबाड़ डीलरों का रिकॉर्ड भी अब उंगलियों पर है।




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