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दिल्ली पुलिस ने किया 'फर्जी' जांच फ्रॉड? 3 परिवारों को नहीं मिला मुआवजा; जानें क्या है पूरा मामला

दिल्ली के नंद नगरी इलाके में 2018 में हुए एक भीषण हादसे में तीन युवकों की जान चली गई थी, लेकिन 8 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद भी उनके परिजनों को न्याय नहीं मिल सका। मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) ने पुलिस की जांच को 'फर्जी' और 'प्लांटेड' मानते हुए मुआवजे की सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं।

Fri, 17 April 2026 07:59 AMPraveen Sharma हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दिल्ली पुलिस ने किया 'फर्जी' जांच फ्रॉड? 3 परिवारों को नहीं मिला मुआवजा; जानें क्या है पूरा मामला

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के नंद नगरी इलाके में 2 फरवरी 2018 की रात तीन परिवारों के लिए किसी कयामत से कम नहीं थी। एक भीषण सड़क हादसे में एक ही बाइक पर सवार रवि कुमार, सतीश कुमार और रोहित की असमय मौत हो गई। मृतकों के परिजनों ने न्याय और मुआवजे की उम्मीद में ‘मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण’ (एमएसीटी) का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 8 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जो फैसला आया, उसने उन्हें झकझोर कर रख दिया।

दिल्ली पुलिस की लापरवाही और कथित ‘फर्जी’ जांच के कारण न्यायाधिकरण ने मुआवजे की सभी याचिकाएं खारिज कर दीं। पुलिस की एक गलत जांच ने न केवल कानूनी प्रक्रिया को गुमराह किया, बल्कि उन बेसहारा परिवारों की उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया, जो 8 सालों से न्याय की बाट जोह रहे थे।

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जांच में बड़ा उलटफेर

न्यायाधिकरण ने पाया कि इस मामले में पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट और डार रिपोर्ट विरोधाभासों से भरी थी। शुरुआती जांच और चश्मदीदों के बयानों में दुर्घटना करने वाले ट्रक का नंबर HR-55G-7002 सामने आया था। हालांकि, जैसे ही यह पता चला कि उस ट्रक का बीमा नहीं था, गवाहों के बयान रहस्यमयी तरीके से बदल गए। नया नंबर HR-69A-0881 बताया जाने लगा, जिसका बीमा प्रभावी था। चौंकाने वाली बात यह थी कि दोनों ट्रकों का मालिक एक ही व्यक्ति था। अदालत ने इसे ‘प्लांटेड’ (फर्जी) मामला माना, क्योंकि यह साबित ही नहीं हो सका कि दुर्घटना वास्तव में दूसरे ट्रक से हुई थी। जांच अधिकारी ने गवाहों की लोकेशन तक नहीं जांची और न ही प्राथमिक सबूतों को जब्त करना जरूरी समझा।

‘केस ही खत्म कर दिया’

रवि कुमार के भाई ललित का कहना है कि 8 साल तक कोर्ट के चक्कर लगाने के बाद परिवार पूरी तरह टूट चुका है। रवि अपनी बुजुर्ग मां के साथ रहता था। उन्होंने आरोप लगाया कि न्याय में देरी और पुलिस की लापरवाही से उनका हक छिन गया। अब उन्हें डर है कि ऊंची अदालतों में भी न्याय मिल पाएगा या नहीं।

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अनुकंपा पर नौकरी

मृतक सतीश को पिता के निधन के बाद अनुकंपा के आधार पर तिहाड़ जेल में एलडीसी की नौकरी मिली थी। वह अपनी पांच बहनों और बीमार मां का इकलौता सहारा था। सतीश की चार बहनें अभी भी अविवाहित हैं और घर की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय हो चुकी है। वहीं, तीसरे मृतक रोहित के माता-पिता की मौत हादसे से महज एक महीने पहले ही हुई थी, जिसके बाद वह अपने भाइयों के साथ रह रहा था।

पुलिस की कार्यप्रणाली को ‘पक्षपातपूर्ण’ बताया

न्यायाधिकरण ने पुलिस की इस कार्यप्रणाली को ‘पक्षपातपूर्ण’ करार दिया है। कोर्ट ने संबंधित जिला पुलिस उपायुक्त को दोषी जांच अधिकारी के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, मामले की एक कॉपी दिल्ली पुलिस कमिश्नर को भी सूचना और आवश्यक सुधार के लिए भेजने को कहा गया है, ताकि भविष्य में जांच में ऐसी धांधली न हो। पीड़ित 8 साल बाद भी खाली हाथ हैं।

रिपोर्ट : रजनीश कुमार पाण्डेय

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