दिल्ली के साध नगर में एक साथ एक ही परिवार की 9 चिताएं जलीं, कलेजे को चीर देने वाला था मंजर
दिल्ली के मंगलापुरी शमशान घाट पर जब एक के बाद एक नौ चिताएं लगाई गईं तो वहां मौजूद हर आंख नम थी और हर दिल भारी। वह घर जो कुछ घंटों पहले तक एक खुशहाल कुनबा था, उसके 9 लोग देखते ही देखते काल के मुंह में समा गए। यह दृश्य हर किसी के कलेजे को चीर देने वाला था।

दिल्ली के मंगलापुरी शमशान घाट पर जब एक के बाद एक नौ चिताएं लगाई गईं तो वहां मौजूद हर आंख नम थी और हर दिल भारी। वह घर जो कुछ घंटों पहले तक एक खुशहाल कुनबा था, उसके 9 लोग देखते ही देखते काल के मुंह में समा गए। यह दृश्य हर किसी के कलेजे को चीर देने वाला था।
पालम इलाके में हुए अग्निकांड में 19 लोगों के परिवार में से नौ लोग मौत के मुंह में समा गए। वहीं, तीन गंभीर रूप से घायल हालत में अस्पताल में जिंदगी के लिए जंग लड़ रहे हैं। परिजनों ने देर शाम ही मंगलापुरी श्मशान घाट में सभी शवों के दाह संस्कार किए। इस दौरान परिवार के मुखिया राजेंद्र कश्यप कई बार शवों को चिताओं को देखते हुए बेहोश हो गए। इस दौरान परिजनों व स्थानीय लोगों ने उन्हें संभाला। स्थानीय लोगों ने बताया कि इलाके के हजारों लोगों की मौजूदगी में फैसला लिया गया कि सुबह का इंतजार नहीं किया जाएगा।
गलियों में पसरा रहा सन्नाटा
पालम के साध नगर की वो संकरी गलियां जो कभी बच्चों की खिलखिलाहट और व्यापार की चहल-पहल से गूंजती थीं, मातम के सन्नाटे में डूबी थीं। यह एक ग्रामीण इलाका भी है। सब लोग एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहते हैं। पूरे दिन लोगों का तांता कश्यप परिवार के घर के बाहर लगा रहा। बुधवार को किसी के घर पर चूल्हा नहीं जला।
जो बाहर गए थे, वो बच गए
राजेन्द्र कश्यप के पांच बेटे कमल, सुनील, प्रवेश, अनिल और सचिन हैं। एक बेटी है हिमांशी। सचिन और हिमांशी का विवाह नहीं हुआ था। यह पूरा 19 लोगों का एक बड़ा परिवार था। बुधवार सुबह 19 में से परिवार के बारह लोग घर पर मौजूद थे, जबकि सात लोग अलग-अलग कारणों से बाहर थे।
राजेन्द्र कश्यप गोवा गए हुए थे। सुनील अपनी पत्नी डॉली और बेटे हर्षित और कैरव के साथ हिमाचल गए हुए थे। प्रवेश ने एक दिन पहले ही अपनी पत्नी कविता और बेटे व्योम को उनके ननिहाल में नजफगढ़ छोड़ा था। घर से बाहर होने के चलते परिवार के ये लोग तो हादसे की चपेट में आने से बच गए, जबकि इमारत के अंदर मौजूद परिवार के सदस्यों को या तो जान गंवानी पड़ी या फिर वे गंभीर हालत में पहुंच गए हैं।
परिजन घर लौटे तो खत्म हो चुका था आधा परिवार
हादसे की सूचना मिलने के बाद परिवार के लोग जब तक दिल्ली लौटे, उनका आधा परिवार तब तक दुनिया छोड़ चुका था। हादसे के बाद द्वारका स्थित मणिपाल अस्पताल में परिजनों और गांव के लोगों का तांता लग गया। राजेंद्र की दुकान में काम करने वाले स्टाफ व परिजनों समेत सैकड़ों लोग बुधवार देर शाम तक अस्पताल में मौजूद रहे। इस दौरान लोगों का आना-जाना लगा रहा।
राजेंद्र कश्यप के परिवार में उनकी पत्नी लाडो, पांच बेटे कमल, प्रवेश, सुनील, अनिल, सचिन व एक बेटी हिमांशी थे। प्रवेश, सुनील, कमल व अनिल की शादी हो चुकी थी। बेटी हिमांशी व सचिन की शादी नहीं हुई थी। प्रवेश की पत्नी कविता व एक बेटा व्योम, सुनील की पत्नी गौरी व दो बेटे हैं। कमल की पत्नी आशू व तीन बच्चे और अनिल की पत्नी दीपिका थे। सुनील दिल्ली मेट्रो में कस्टमर रिलेशन असिस्टेंट हैं। हिमांशी पीएचडी कर रही थी और एक एनजीओ के साथ काम करती थी।
बाकी बेटे पारिवारिक कारोबार व दुकान में पिता की मदद करते थे। सचिन को बॉडी बिल्डिंग का भी शौक है। राजेंद्र कश्यप के मित्र एसपी बजाज ने बताया कि राजेंद्र दूसरी बार मार्केट एसोसिएशन के प्रधान चुने गए हैं। वह स्वभाव से काफी अच्छे हैं और पूरा परिवार इसी तरह का है। पिछले करीब 50 साल से उनकी यह दुकान मार्केट में मौजूद है। उनकी दुकान में करीब दो दर्जन कर्मचारी काम करते हैं। उन्होंने भावुक होते हुए बताया कि उन्होंने शून्य से दुकान की शुरुआत की थी और अपनी मेहनत व लगन से इतना आगे बढ़ाया लेकिन आज दुकान और आधा परिवार एक साथ स्वाहा हो गए।




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