शारीरिक संबंध भी नहीं बनें; शादी के 7 दिन बाद ही अलग हुए पति-पत्नी को दिल्ली HC से राहत
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि यदि विवाह न तो पूर्ण हुआ हो और न ही पति-पत्नी के बीच कोई शारीरिक संबंध बनें और वे शादी के तुरंत बाद अलग हो गए हों, तो ऐसे में वैवाहिक संबंध को वास्तविक रूप से विकसित नहीं माना जा सकता।

दिल्ली हाई कोर्ट ने वैवाहिक जोड़े को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि विवाह पूर्ण नहीं हुआ हो और न ही पति-पत्नी के बीच कोई शारीरिक संबंध बनें और वे शादी के तुरंत बाद अलग हो गए हों, तो ऐसे में वैवाहिक संबंध को वास्तविक रूप से विकसित नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 14 के तहत तलाक के लिए अनिवार्य 1 वर्ष की प्रतीक्षा अवधि को लागू करना जरूरी नहीं है। हाई कोर्ट ने यह फैसला फैमिली कोर्ट के एक वर्ष का इंतजार करने वाले फैसले को पलट दिया।
जस्टिस विवेक चौधरी और रेणु भटनागर की बेंच ने कहा, "शारीरिक संबंध की पूर्ण अनुपस्थिति, साथ ही विवाह के तुरंत बाद अलगाव से स्पष्ट है कि वैवाहिक संबंध कभी सार्थक रूप से विकसित ही नहीं हुआ।" कोर्ट ने साफ कहा कि जब शादी सिर्फ कागजों में हो और असल जिंदगी में पति-पत्नी के बीच कोई रिश्ता बना ही न हो, तो उसे जबरन जारी रखना ठीक नहीं।
केवल 7 दिन साथ रहे दंपति
लाइव एंड लॉ में छपी खबर के मुताबिक, मई 2025 में विवाहित दंपति केवल 7 दिनों तक साथ रहे। विवाह अपूर्ण रहा, कोई संतान नहीं हुई। दोनों ने आपसी सहमति से तलाक का समझौता किया, लेकिन फैमिली कोर्ट ने 1 वर्ष का इंतजार न मनवाने पर इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई की और 'असाधारण कठिनाई' का हवाला देकर छूट दी।
कोर्ट का तर्क: इंतजार का कोई मतलब नहीं
कोर्ट ने कहा कि धारा 14 का मकसद पुनर्विचार और सुलह का मौका देना है, लेकिन प्रोविजो में असाधारण कठिनाई पर छूट का प्रावधान है।
चैंबर में बातचीत के बाद संतुष्टि जताते हुए कोर्ट ने नोट किया, "दोनों ने आपसी समझौता किया है, वैवाहिक जीवन की कोई संभावना नहीं। कानूनी तलाक को लंबा खींचना बेकार है।" मामला फैमिली कोर्ट को तेजी से निपटाने के लिए भेजा गया।




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