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जिंदा रहने की प्रवृत्ति बुनियादी होती है, HC ने पत्नी की आत्महत्या के लिए पति को दोषी ठहराया

दिल्ली हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि आत्महत्या तेजी से सभ्य दुनिया की एक समस्या बनती जा रही है, जो अक्सर तनाव, सामाजिक दबाव व सहयोग प्रणालियों के टूटने के कारण होती है। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराते हुए की।

Sat, 21 March 2026 05:59 PMSubodh Kumar Mishra लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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जिंदा रहने की प्रवृत्ति बुनियादी होती है, HC ने पत्नी की आत्महत्या के लिए पति को दोषी ठहराया

दिल्ली हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि आत्महत्या तेजी से सभ्य दुनिया की एक समस्या बनती जा रही है, जो अक्सर तनाव, सामाजिक दबाव व सहयोग प्रणालियों के टूटने के कारण होती है। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराते हुए की।

जस्टिस विमल कुमार यादव की पीठ ने ये टिप्पणियां पति द्वारा दायर अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कीं। पीठ पति की सजा को दहेज मृत्यु से बदलकर आत्महत्या के लिए उकसाना के तहत कर दिया है। हालांकि दहेज प्रताड़ना के तहत पति की सजा को बरकरार रखा है। आत्महत्या की प्रकृति पर विचार करते हुए पीठ ने कहा कि जीवित रहने की प्रवृत्ति सभी जीवित प्राणियों में बुनियादी होती है। अपनी जान लेना अक्सर ऐसी मजबूर करने वाली परिस्थितियों का परिणाम होता है, जो इस प्रवृत्ति पर हावी हो जाती हैं।

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यह मामला जुलाई 1999 में अपीलकर्ता की पत्नी की मृत्यु से संबंधित है। महिला ने शादी के सात साल के भीतर आत्महत्या कर ली थी। उसकी मृत्यु किसी ऐसे पदार्थ का सेवन करने से हुई, जिसके जहर होने का संदेह था। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि मृतका को 50 हजार की दहेज की मांगों के संबंध में प्रताड़ित किया गया, जिसमें से 30 हजार उसके परिवार द्वारा पहले ही चुका दिए गए।

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यह भी आरोप लगाया गया कि शेष रकम के लिए उसे लगातार दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। मृतका के माता-पिता व भाई की गवाही के आधार पर सत्र अदालत ने पति को दहेज प्रताड़ना व दहेज हत्या के तहत दोषी ठहराया था। पति को सात साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी।

सजा के खिलाफ पति की अपील पर पीठ ने पाया कि जहां दहेज की मांगों के संबंध में उत्पीड़न व क्रूरता साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद थी। वहीं यह दिखाने के लिए कोई निर्णायक सबूत नहीं था कि अपीलकर्ता ने मृतक की मृत्यु का कारण बनाया था।

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कोर्ट ने मृतक के भाई को दिए गए कथित डाइंग डिक्लेरेशन (मृत्यु-पूर्व बयान) पर संदेह व्यक्त किया। पीठ ने उसके बयान में विसंगतियों तथा मेडिकल रिकॉर्ड में इस बात का उल्लेख किया कि मृतक उस समय बयान देने की स्थिति में नहीं थी।

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