कोमा में पड़े सैनिक की पत्नी को मिली IVF जारी रखने की अनुमति, HC ने फैसले में किया भागवत पुराण का जिक्र
अदालत ने अपने फैसले में भागवत पुराण का हवाला भी दिया और कहा कि, 'एक जीवित प्राणी को 'दैव' की देखरेख में शरीर मिलता है।' ऐसे में कोर्ट को ऐसी चीज की जिद करके याचिकाकर्ता की किस्मत में दखल नहीं देना चाहिए, जो शारीरिक रूप से असंभव और अव्यावहारिक है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक महिला को अपने सैनिक पति के साथ संतान पैदा करने के लिए IVF (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है। सेना का यह जवान फिलहाल 'पर्सीस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट' यानी कोमा जैसी स्थिति में है और आगे भी उसके ठीक होने की संभावना बहुत कम है। अदालत ने कहा कि इस मामले में पुरुष की दी हुई पुरानी सहमति को ही वैध माना जाएगा। कोर्ट ने यह आदेश जवान की पत्नी की याचिका पर दिया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि 'किसी प्रक्रिया के कठोर पालन के नाम पर कानून के मूल उद्देश्य को खत्म करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को संतान होगी या नहीं, यह इंसान के हाथ में नहीं है। जवान की पत्नी ने अपनी याचिका में कोर्ट से गुहार लगाई थी कि उसके पति के जेनेटिक मटीरियल (शुक्राणु) को निकालकर IVF के लिए सुरक्षित रखा जाए।
'पुरानी सहमति को ही इस समय भी माना जाएगा'
मामले में फैसला सुनाते हुए जस्टिस पुरुशेंद्र कुमार कौरव ने कहा कि जवान द्वारा IVF प्रक्रिया शुरू करते समय जो सहमति दी गई थी, वह इस समय भी उचित मानी जाएगी। साथ ही अदालत ने कहा कि 'असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट' के तहत, उसकी पत्नी की सहमति को उसकी ओर से दी गई वैध सहमति माना जाएगा।
‘संतान होगी या नहीं, यह इंसान के हाथ में नहीं’
इस मामले में आर्मी हॉस्पिटल के मेडिकल बोर्ड ने राय देते हुए कहा था कि इस बात की संभावना बहुत कम है कि जवान के शरीर में जीवित शुक्राणु मिलेंगे। इस संबंध में कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को संतान होगी या नहीं, यह इंसान के हाथ में नहीं है। कोर्ट ने कहा, 'यह किस्मत ही तय करती है कि किसी व्यक्ति को माता-पिता बनने का सौभाग्य मिलेगा या नहीं।' अदालत ने अपने फैसले में भागवत पुराण का हवाला भी दिया और कहा कि, 'एक जीवित प्राणी को 'दैव' की देखरेख में शरीर मिलता है।' ऐसे में कोर्ट को ऐसी चीज की जिद करके याचिकाकर्ता की किस्मत में दखल नहीं देना चाहिए, जो शारीरिक रूप से असंभव और अव्यावहारिक है।
क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ता महिला ने बताया कि जून 2023 में पति-पत्नी ने बच्चा पैदा करने के लिए IVF प्रक्रिया अपनाने का फैसला किया था। लेकिन जुलाई 2025 में, गश्त के दौरान उसके पति काफी ऊंचाई से गिर गए, जिससे उनके दिमाग में गंभीर चोट लग गई और वह कोमा जैसी स्थिति में चले गए। इसके बाद आर्मी अस्पताल में इलाज करवाने के दौरान इस जोड़े का IVF इलाज रोक दिया गया।
'पति-पत्नी ने मर्जी से IVF का विकल्प चुना था'
इसके बाद महिला ने अपने मातृत्व अधिकार, गरिमा और प्रजनन स्वायत्तता का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। 13 अप्रैल को दिए गए अपने फैसले में, कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता और उसके पति ने अपनी मर्जी से IVF इलाज का विकल्प चुना था। कोर्ट के रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत या संकेत नहीं मिला, जिससे यह लगे कि पति ने इस इलाज के लिए सहमति नहीं दी थी।
'तो IVF शुरू करने का मकसद ही खत्म हो जाएगा'
कोर्ट ने कहा कि भले ही इस समय याचिकाकर्ता के पति की ओर से सहमति का कोई स्पष्ट संकेत न हो, फिर भी अधिकारियों के लिए यह निष्पक्ष, उचित और न्यायसंगत होगा कि वे IVF प्रक्रिया को उसके तार्किक अंजाम तक पहुंचाने के लिए जरूरी कदम उठाएं। कोर्ट ने आगे कहा, 'अगर ऐसा नहीं किया गया, तो याचिकाकर्ता के पति द्वारा पहले दी गई सहमति बेकार हो जाएगी, और IVF इलाज शुरू करने का पूरा मकसद ही खत्म हो जाएगा।'
‘अधिकार बढ़ना चाहिए, ना कि उसमें कमी होनी चाहिए’
फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अधिकारी याचिकाकर्ता को केवल इस आधार पर अयोग्य नहीं ठहरा सकते कि याचिकाकर्ता के पति की लिखित सहमति मौजूद नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि IVF से जुड़ी किसी भी प्रक्रिया के लिए याचिकाकर्ता की सहमति को उसके पति की ओर से वैध सहमति माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि ‘यह याद रखना जरूरी है कि प्रजनन संबंधी स्वायत्तता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। ART एक्ट की व्याख्या इस तरह से की जानी चाहिए, जिससे इस अधिकार को बढ़ावा मिले, न कि इससे कोई कटौती हो।'




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