दिल्ली पुलिस ने पकड़ा 1000 चोरी की कारें बेचने वाला गैंग, सरकारी बाबू ही निकला मास्टरमाइंड
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक ऐसे संगठित वाहन चोर गिरोह का पर्दाफाश किया है जिसने तकनीक और सिस्टम की कमियों का फायदा उठाकर अपराध जगत में हड़कंप मचा दिया था। गिरोह ने दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश तक अपना जाल फैला रखा था।

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक बड़े अंतरराज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ किया है, जिसने बैंक की जाली एनओसी और ‘वाहन पोर्टल’ में फर्जी एंट्री के जरिये 1000 से अधिक चोरी की महंगी कारों को वैध दिखाकर बेच दिया। इस संगठित नेटवर्क में हिमाचल प्रदेश के एक सरकारी कर्मचारी की भी अहम भूमिका सामने आई है। पुलिस ने अब तक 10 आरोपियों को गिरफ्तार कर 31 हाई-एंड वाहन बरामद किए हैं।
पुलिस के मुताबिक, यह गिरोह दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश तक फैला हुआ था और बेहद सुनियोजित तरीके से काम करता था। गिरोह के सदस्य चोरी से लेकर फर्जी रजिस्ट्रेशन और बिक्री तक पूरी प्रक्रिया को एक संगठित श्रृंखला के रूप में अंजाम देते थे। खास बात यह है कि एक सरकारी कर्मचारी ही इस पूरे रैकेट का सरगना निकला, जो ‘वाहन पोर्टल’ का दुरुपयोग कर चोरी की गाड़ियों को वैध बनाता था।
ये आरोपी गिरफ्तार, दमनदीप उर्फ लकी गैंग का मास्टरमाइंड
गिरफ्तार आरोपियों में जालंधर निवासी दमनदीप सिंह उर्फ लकी, कवलजीत उर्फ जॉली, हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर निवासी सुभाष चंद, चंडीगढ़ निवासी अरविंद शर्मा, पीतमपुरा निवासी अमनदीप, अमृतसर निवासी मनबीर सिंह उर्फ मिंटा, बृज मोहन कपूर उर्फ बॉबी, फरीदाबाद निवासी प्रदीप सिंह उर्फ हीरा, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी निवासी तिफलजे नौखेज और पंजाब निवासी हेमराज सिंह उर्फ हेमा शामिल हैं। पुलिस के अनुसार दमनदीप सिंह उर्फ लकी गिरोह का मास्टरमाइंड है, जबकि प्रदीप सिंह चेसिस नंबर बदलने में विशेषज्ञ है। अरविंद शर्मा फर्जी दस्तावेज और बैंक की नकली एनओसी तैयार करता था, जबकि सुभाष चंद ‘वाहन पोर्टल’ के जरिए फर्जी रजिस्ट्रेशन कराने में अहम भूमिका निभाता था।
जांच में सामने आया कि सुभाष चंद ने फर्जी ओटीपी और अवैध लॉगिन क्रेडेंशियल का इस्तेमाल कर 350 से अधिक वाहनों का रजिस्ट्रेशन असली की तरह कराया। वहीं कवलजीत उर्फ जॉली और बृज मोहन कपूर उर्फ बॉबी जैसे आरोपी पुरानी कारों के कारोबारी थे, जो इन वाहनों को अनजान ग्राहकों को बेचते थे। गिरोह सबसे पहले महंगी गाड़ियों को चोरी करता था या लोन डिफॉल्ट वाले वाहनों को सस्ते में खरीदता था। इसके बाद तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से वाहनों के चेसिस नंबर में बदलाव किया जाता था। चेसिस नंबर बदलने के बाद फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते थे, जिनमें फॉर्म-21 और बैंक की नकली एनओसी शामिल होती थी। इसके बाद ‘वाहन पोर्टल’ का दुरुपयोग कर फर्जी ओटीपी और लॉगिन के जरिये इन गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन इस तरह किया जाता था कि वे पूरी तरह वैध प्रतीत हों। इस प्रक्रिया के चलते आम खरीदारों को यह समझ ही नहीं आता था कि वे चोरी की गाड़ी खरीद रहे हैं। पुलिस ने आरोपियों के पास से चेसिस नंबर बदलने के उपकरण भी बरामद किए हैं।
इस तरह बंटे हुए थे काम
पुलिस के अनुसार, मनबीर सिंह उर्फ मिंटा जैसे समन्वयक चोरी के वाहन जुटाते थे। प्रदीप उर्फ हीरा चेसिस नंबर बदलता, अरविंद शर्मा फर्जी दस्तावेज तैयार करता। सुभाष चंद ‘वाहन पोर्टल’ से रजिस्ट्रेशन वैध दिखाता। हेमराज वाहन हिमाचल में रजिस्टर कराता, जबकि अमनदीप जैसे बिचौलिये उन्हें अन्य राज्यों में बेचने में मदद करते थे।
तस्करी में इस्तेमाल
फर्जी पहचान वाली इन गाड़ियों का इस्तेमाल ड्रग्स तस्करी जैसे गंभीर अपराधों में भी किया जा रहा था। चूंकि इन वाहनों के दस्तावेज पूरी तरह असली लगते थे, इसलिए इनका इस्तेमाल अवैध गतिविधियों में आसानी से किया जाता था।
जनता के लिए चेतावनी
पुलिस ने चेतावनी दी है कि पुरानी गाड़ी खरीदते समय केवल कागजों पर भरोसा न करें। चेसिस, इंजन नंबर और पंजीकरण की जांच करें तथा जरूरत पड़ने पर अधिकृत एजेंसी या पुलिस से सत्यापन कराएं। मामले में जांच जारी है, अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।
ऐसे हुई जांच शुरू
क्राइम ब्रांच के अनुसार, 5 अगस्त को पीतमपुरा से महिला की क्रेटा कार चोरी की जांच में इस गिरोह का खुलासा हुआ। इंटर स्टेट सेल ने कड़ियां जोड़कर बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश किया। पुलिस ने छापेमारी कर 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया। गिरोह ने 1000 से अधिक वाहनों के फर्जी पंजीकरण में भूमिका निभाई। बरामद 31 गाड़ियों में फॉर्च्यूनर, इनोवा, थार, स्कॉर्पियो और क्रेटा शामिल हैं।
पुराना वाहन खरीदते समय इन बातों का ध्यान रखें
- कागजात अच्छी तरह जांचें। मूल आरसी देखें, फोटोकॉपी पर भरोसा न करें। चेसिस और इंजन नंबर जरूर मिलान करें।
2. मालिक की पुष्टि करें। वाहन बेचने वाला ही असली मालिक हो, अन्यथा वैध पावर ऑफ अटॉर्नी जरूरी है।
3. आरसी में हाइपोथेकशन चेक करें। बैंक एनओसी लें और इंश्योरेंस चालू व अपने नाम ट्रासफर कराएं।
4. पुलिस व आरटीओ रिकॉर्ड जांचें। गाड़ी चोरी या ब्लैकलिस्टेड न हो, चालान पेंडिंग न हो।
5. खरीद के 14 दिन के भीतर ओनरशिप ट्रांसफर कराएं। लिखित एग्रीमेंट में रकम, तारीख व जिम्मेदारी स्पष्ट रखें।




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