दिल्ली की अदालत ने उपराज्यपाल वीके सक्सेना को दी राहत, 26 साल पुराने मामले में किया बरी
पाटकर और सक्सेना के बीच यह मुकदमा साल 2000 से चल रहा है, जब पाटकर ने उनके और 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' के खिलाफ विज्ञापन प्रकाशित करने के लिए उनके खिलाफ मुकदमा दायर किया था।

दिल्ली की एक कोर्ट ने गुरुवार को उपराज्यपाल वीके सक्सेना को एक बड़ी राहत दी और उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर द्वारा दायर 26 साल पुराने मानहानि के एक मामले में बरी कर दिया। ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास राघव शर्मा की अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि शिकायतकर्ता उनके खिलाफ अपने आरोपों को साबित करने में विफल रही।
इससे पहले मार्च 2025 में अदालत ने मामले में मेधा पाटकर की अतिरिक्त गवाहों की जांच करने की अर्जी को गैर जरूरी बताते हुए खारिज कर दिया था। तब कोर्ट ने कहा था कि यह जानबूझकर मुकदमे में देरी करने के लिए की गई कोशिश है, और इसकी कोई वास्तविक जरूरत नहीं है।
पाटकर और सक्सेना के बीच यह मुकदमा साल 2000 से चल रहा है, जब पाटकर ने उनके और 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' के खिलाफ विज्ञापन प्रकाशित करने के लिए उनके खिलाफ मुकदमा दायर किया था। सक्सेना उस समय अहमदाबाद स्थित एक NGO 'नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज' के प्रमुख थे।
सक्सेना ने भी साल 2001 में पाटकर के खिलाफ एक टीवी चैनल पर उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने और मानहानिकारक प्रेस बयान जारी करने के लिए दो मामले दायर किए थे। जिनमें से एक मामले में कोर्ट ने हाल ही में पाटकर को बरी किया है।
सक्सेना की याचिका पर पिछले हफ्ते 25 जनवरी को दिए अपने फैसले में दिल्ली की एक अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ता को दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना द्वारा दायर मानहानि के आपराधिक मामले में बरी कर दिया था। यह मामला साल 2006 में एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान पाटकर द्वारा की गई टिप्पणियों से संबंधित था। अदालत ने कहा कि सक्सेना कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों को रिकॉर्ड करने वाले मूल रिकॉर्डिंग उपकरण या संपूर्ण वीडियो फुटेज को प्रस्तुत करने में विफल रहे।
शिकायत के अनुसार, पाटकर ने कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर दावा किया था कि सक्सेना और उनके NGO (गैर सरकारी संगठन) NCCL को सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े निर्माण कार्य संबंधी ठेके मिले थे। सक्सेना ने इस आरोप का खंडन करते हुए इसे मानहानिकारक माना था।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से पता चलता है कि पाटकर कार्यक्रम में परिचर्चा के दौरान शामिल नहीं थीं और प्रसारण के दौरान केवल उनका एक छोटा और पूर्व में रिकॉर्ड किया गया वीडियो क्लिप चलाया गया था। यह शिकायत मूल रूप से अहमदाबाद में दायर की गई थी और उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर इसे 2010 में दिल्ली स्थानांतरित किया गया था।




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