दिल्ली की कोर्ट ने भाजपा सांसद योगेंद्र चंदोलिया को दी बड़ी राहत, 6 साल पुराने मामले में किया बरी
चांदोलिया की तरफ से पेश वकील ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष के आरोप न तो कानूनी तौर पर और न ही तथ्यात्मक रूप से टिकने योग्य हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के आरोपों को बिना सोचे-समझे मानकर गलती की है।

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उत्तर-पश्चिमी दिल्ली से भाजपा सांसद योगेंद्र चांदोलिया को एक बड़ी राहत देते हु्ए साल 2020 के एक आपराधिक मामले में बरी कर दिया है। चांदोलिया पर एक सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालने और उसे ड्यूटी निभाने से रोकने के लिए आपराधिक बल का प्रयोग करने और गलत तरीके से रास्ता रोकने का आरोप लगा था। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) नेहा मित्तल ने शुक्रवार, 15 मई को इस मामले का फैसला करते हुए चांदोलिया को बरी करने का आदेश जारी किया।
अदालय ने यह फैसला एक कानूनी मिसाल के आधार पर दिया, जिसमें बताया गया कि कोर्ट एक ही मामले में अपराधों को अलग-अलग करके नहीं देख सकता। ACJM मित्तल ने फैसला सुनाते हुए कहा, 'देवेंद्र कुमार के फैसले में तय किए गए कानूनी अनुपात को ध्यान में रखते हुए, यह अदालत अपराधों को अलग नहीं कर सकता। कोर्ट आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 341, 353, 356, 34 के तहत कार्रवाई नहीं कर सकता, जबकि उसी समय उसे IPC की धारा 186 के तहत बरी कर रहा हो। इसलिए, उसे इस मामले से बरी किया जाता है।'
लगभग छह साल पुराना है मामला
अदालत ने यह फैसला चांदोलिया की उस याचिका पर सुनाया, जिसमें उन्होंने निचली अदालत के उस पिछले फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसने उनके खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया था। यह मामला 7 अक्टूबर, 2020 को करोल बाग के टैंक रोड इलाके में हुई एक घटना से जुड़ा है। जब योगेंद्र चांदोलिया सांसद नहीं बने थे।
प्रसाद नगर पुलिस स्टेशन में ट्रैफिक हेड कांस्टेबल राजकुमार द्वारा दर्ज FIR के अनुसार, शिकायतकर्ता एक क्रेन के साथ ड्यूटी पर था और गलत तरीके से पार्क किए गए वाहनों को हटा रहा था, तभी उसने गलत तरीके से पार्क किए गए एक स्कूटर को हटाने का आदेश दिया।
चांदोलिया ने क्रेन का रास्ता रोक, शुरू कर दी थी बहस
शिकायत में दी गई जानकारी के अनुसार इसी दौरान वहां पहुंचे योगेंद्र चांदोलिया ने क्रेन का रास्ता रोक दिया, अधिकारी से बहस की, और वहां जमा भीड़ को उकसाते हुए चिल्लाना शुरू कर दिया। अपनी शिकायत में ट्रैफिक पुलिसकर्मी ने दावा किया कि जब उसने इस बहस को रिकॉर्ड करने की कोशिश की, तो चांदोलिया ने उसे क्रेन से नीचे खींचने और उसका फोन छीनने की कोशिश की। हालांकि इस बीच पुलिसकर्मी ने अपना फोन बीरा नाम के एक क्रेन मजदूर को सौंप दिया, लेकिन आखिर में आरोपी के एक अज्ञात साथी ने उसे छीन लिया था।
सालभर पहले निचली अदालत ने दिया था आरोप तय करने का आदेश
योगेंद्र चांदोलिया ने इस याचिका में निचली अदालत द्वारा उनके खिलाफ आरोप तय करने के 3 मई 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। चांदोलिया की तरफ से पेश वकील ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष के आरोप न तो कानूनी तौर पर और न ही तथ्यात्मक रूप से टिकने योग्य हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के आरोपों को बिना सोचे-समझे मानकर गलती की है।
बचाव पक्ष ने मामले को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने जांच में मौजूद गंभीर कमियों को भी उजागर किया था। उन्होंने बताया कि स्वतंत्र चश्मदीद गवाहों की गवाही पूरी तरह से नदारद थी, घटनास्थल से कोई सहायक CCTV फुटेज नहीं मिला था, और शारीरिक बल के इस्तेमाल के दावों को साबित करने के लिए कोई मेडिकल सबूत या चोट की रिपोर्ट भी मौजूद नहीं थी। इसके साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि यह मामला एक जनप्रतिनिधि को परेशान करने की राजनीतिक रूप से प्रेरित कोशिश थी।




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