सेना में भेदभाव ठीक नहीं, महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन का पूरा हक; सुप्रीम कोर्ट सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि महिला सैन्य अधिकारी भी परमानेंट कमीशन की उतनी ही हकदार हैं जितना कि उनके पुरुष समकक्ष हैं। महिला अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि उनके साथ स्थायी कमीशन देने में भेदभाव किया जाता है।

महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत सेवा देने वाली महिला सैन्य अधिकारी भी परमानेंट कमीशन की हकदार हैं और उनके साथ किसी तरह के भेदभाव नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिला सैन्य अधिकारियों के साथ न्याय होना चाहिए।
भेदभाव पूर्ण हो गया सिस्टम
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह पूरे तंत्र की निष्पक्षता दिखाता है कि एसएससी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन नहीं दिया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि आदेश दिया गया था कि कम से कम 250 महिला अधिकारियों को हर साल स्थायी कमीशन दिया जाएगा और इसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट ने अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए यह टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि थलसेना और नौसेना दोनों में महिला अधिकारियों के साथ भेदभाव हो रहा है तो इसका निदान करना बहुत जरूरी है।
महिला अधिकारियों के साथ भेदभाव अन्याय है
सीजेाई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, पुरुष शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी (SSCO) ही केवल स्थायी कमीशन के हकदार नहीं हो सकते। अगर महिलाओं को स्थायी कमीशन देने में भेदभाव किया जा रहा है तो यह अन्याय है। एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट की बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जैसे मान लिया गया है कि महिलाएं परमानेंट कमीशन के योग्य ही नहीं हैं।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि थलसेना, नौसेना और वायुसेना की शॉर्ट सर्विस कमीशन महिला अधिकारियों को 14 साल की सेवा के बाद भी पेंशन का फायदा मिलना चाहिए। जबकि सेना में 20 साल की सेवा के बाद ही पेंशन का प्रावधान किया गया था। कोर्ट ने कहा था कि महिला अधिकारी भी मेडिकल क्राइटीरिया और डिसिप्लिनरी क्लियरेंस के बाद स्थायी कमीशन की हकदार हैं। केवल कुछ फील्ड में यह लागू नहीं होगा।
बता दें कि महिला सैन्य अधिकारियों ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि ऑपरेसन सिंदूर जैसे अभियानों में भाग लेने के बाद भी उन्हें स्थायी कमीशन देने में पुरुष समकक्षों के साथ उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच को महिला अधिकारियों ने बताया था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी पालन नहीं किया जा रहा है।
अधिकारियों की तरफ से पेश वकील ने कहा कि 2020 और 2021 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आदेश का बार-बार उल्लंघन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि स्थायी कमीशन में महिला अधिकारियों की कमी है। 2021 के बाद कई बार ऐसा हुआ है जब 250 की सीमा का उल्लंघन किया गया है। उन्होंने कहा कि महिला अधिकारी बहुत ही प्रतिभाशाली हैं और महत्वपूर्ण अभियानों में बड़ी भूमिका निभा चुकी है। इसके बाद भी उनके साथ हो रहा भेदभाव बहुत दुखद है।




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