कतर के रास लफान में LNG सेंटर पर ईरानी हमले से टेंशन में क्यों भारत? आमजन पर कितना बड़ा संकट
कतर भारतीय कंपनियों को, जिनमें तेल मार्केटिंग कंपनियाँ (OMCs) भी शामिल हैं, लगभग 5 मिलियन मीट्रिक टन LPG की सप्लाई करता है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, कतर भारत को LNG सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा देश है।

ईरान युद्ध ने तीसरे हफ्ते में प्रवेश करते ही विकराल रूप ले लिया है। एक तरफ इजरायल ने ईरान स्थित दुनिया के सबसे बड़े गैस क्षेत्र साउथ पार्स पर हमले किए हैं तो वहीं ईरान ने खाड़ी देशों के कई ऊर्जा ठिकानों को तबाह कर धुआं-धुआं कर दिया है। इसी कड़ी में ईरान ने कतर के प्रमुख गैस केंद्र रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी पर भी हमले किए हैं। इस हमले ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। यह घटनाक्रम न सिर्फ पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा रहा है, बल्कि भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए भी गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
भारत पर सीधा असर क्यों?
कतर के रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी में एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर ईरानी हमला भारत के लिए भी बुरी खबर है क्योंकि भारत कच्चे तेल के लिए 88% से ज़्यादा और गैस के लिए लगभग 50% तक आयात पर निर्भर है, जिसमें कतर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इस युद्ध ने पहले ही भारत के सबसे बड़े गैस सप्लायर, कतर से होने वाले गैस आयात को बाधित कर दिया था और अब उसके LNG ठिकाने पर हमले ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। दरअसल, कतर भारत की कुल लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) का लगभग एक-तिहाई और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का लगभग आधा हिस्सा सप्लाई करता है।
LPG सप्लाई को भी बड़ा स्रोत
LPG (रसोई गैस) का भी लगभग एक-तिहाई हिस्सा भारत कतर से ही आयात करता है। रास लफान, कतर का सबसे बड़ा गैस प्रोसेसिंग हब है। इस पर हमला और वहां के Gas-to-Liquids (GTL) संयंत्र को हुआ नुकसान भारत के लिए दीर्घकालिक आपूर्ति संकट का संकेत है। इससे पहले, यह रुकावट मुख्य रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने के कारण परिवहन संबंधी समस्याओं की वजह से थी, जो कि चिंता का एक अपेक्षाकृत अस्थायी कारण था।
सिर्फ सप्लाई नहीं, कीमतों पर भी असर
अब, रास लफान के 'गैस-टू-लिक्विड्स' प्लांट को हुआ नुकसान एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि इस क्षेत्र में संघर्ष खत्म होने के बाद भी इसे ठीक करने में समय लगेगा। इस बीच, कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 100–110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। भारत का “इंडियन बास्केट” तो इससे भी ऊपर जाकर 146 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है। LPG की कीमतों में पहले ही बढ़ोतरी शुरू हो चुकी है, जबकि पेट्रोल-डीजल की कीमतें फिलहाल नियंत्रित रखी गई हैं।
भारतीय कंपनियों पर प्रभाव
मिडिल-ईस्ट के इस संकट का प्रभाव भारत की प्रमुख तेल और गैस कंपनियों पर भी पड़ने के आसार हैं क्योंकि Petronet LNG Ltd, GAIL India, Gujarat State Petroleum Corporation जैसी कंपनियों की कतर के साथ दीर्घकालिक गैस आपूर्ति समझौते हैं। पेट्रोनेट अकेले करीब 7.5 मिलियन टन LNG प्रति वर्ष आयात करता है। अगर रास लफान की मरम्मत में समय लगता है, तो इन भारतीय कंपनियों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे देश में ऊर्जा संकट और गहरा सकता है।
घरेलू असर: उद्योग और आम जनता
ऊर्जा संकट का असर अभी दो स्तरों पर दिख रहा है। एक औद्योगिक क्षेत्र, जहां गैस की कमी से उत्पादन प्रभावित हो रहा है और दूसरा घरेलू उपभोक्ताओं के स्तर पर, जहां LPG और CNG की कमी देखी जा रही है। हालांकि, सरकार ने वैकल्पिक स्रोतों (जैसे अमेरिका, नॉर्वे, रूस) से आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश शुरू कर दी है, लेकिन इससे लागत बढ़ना तय है।
भारत-कतर व्यापार पर असर
बता दें कि भारत और कतर के बीच व्यापारिक संबंध भी गहरे हैं। दोनों देशों के बीच 2024-25 में 14.14 अरब डॉलर का कुल व्यापार हुआ था। इसमें भारत का आयात 12.46 अरब डॉलर का है। इनमें भी सिर्फ ऊर्जा आयात (LPG, LNG) 11 अरब डॉलर का रहा है। स्थिति साफ है कि भारत का अधिकांश आयात तेल और गैस हैं। ऐसे में इस संकट से न सिर्फ ऊर्जा, बल्कि उर्वरक, केमिकल और प्लास्टिक जैसे अन्य आयात भी प्रभावित हो सकते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो वैश्विक गैस संकट गहरा सकता है और भारत में ऊर्जा महंगाई बढ़ सकती है। इससे आम आदमी परेशान हो सकता है और उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है।




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