स्टालिन को किसने हराया? मुख्यमंत्री से नाराज होकर पकड़ा विजय का हाथ, आज लिया बदला
एमके स्टालिन इस हार के पीछे एक दिलचस्प कहानी भी है। वीएस बाबू वही नेता हैं, जिन्हें कभी स्टालिन के चुनाव अभियान की जिम्मेदारी दी गई थी। उस समय उम्मीद थी कि वे बड़ी जीत दिलाएंगे, लेकिन उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं आए।

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के आते नतीजों ने पूरे राज्य की सियासत को हिला कर रख दिया। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को अपने ही मजबूत गढ़ कोलाथुर सीट पर हार का सामना करना पड़ा है। टीवीके नेता वीएस बाबू ने स्टालिन को करीब 9 हजार वोटों से हराया, जो इस सीट के इतिहास को देखते हुए बेहद चौंकाने वाला है। कोलाथुर सीट 2011 में परिसीमन के बाद बनी थी और तब से इसे स्टालिन का अभेद्य किला माना जाता था। खास बात यह है कि सीएम स्टालिन को हराने वाले वीएस बाबू उनके पूर्व सहयोगी हैं, जो नाराज चल रहे थे। बाबू की जीत एक शक्तिशाली मुख्यमंत्री से एक तरह बदला लेने की कहानी है।
2011 के विधानसभा चुनाव में स्टालिन ने कोलाथुर से एआईएडीएमके के उम्मीदवार सैदाई दुरईसामी को 2,734 वोटों से हराया था। इसके बाद 2016 और 2021 के चुनावों में उन्होंने क्रमशः 37,730 और 70,384 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी। यही वजह थी कि कोलाथुर को डीएमके का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता था। सीएम स्टालिन को दूसरी सीट से यहां लाया गया था, जहां वे छह में से चार बार जीत चुके थे। इस बार उत्तर चेन्नई की इस सीट पर मुकाबला उम्मीद से कहीं ज्यादा टाइट हो गया और स्टालिन को हार का सामना करना पड़ा।
राजनीतिक बदले की कहानी
एमके स्टालिन इस हार के पीछे एक दिलचस्प कहानी भी है। वीएस बाबू वही नेता हैं, जिन्हें कभी स्टालिन के चुनाव अभियान की जिम्मेदारी दी गई थी। उस समय उम्मीद थी कि वे बड़ी जीत दिलाएंगे, लेकिन उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं आए। इसके लिए बाबू को जिम्मेदार ठहराया गया और पद से हटा दिया गया। इसके बाद बाबू ने 2016 में एआईएडीएमके जॉइन कर ली और फरवरी 2026 में वे विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TCK) में शामिल हो गए। अब, उसी बाबू ने स्टालिन को हराकर एक तरह से अपना राजनीतिक बदला पूरा कर लिया है।
2026 के विधानसभा चुनाव में अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके ने बड़ा उलटफेर किया है। दशकों से डीएमके और एआईएडीएमके के बीच सिमटी तमिलनाडु की राजनीति में टीवीके ने तीसरे विकल्प के रूप में खुद को मजबूती से स्थापित किया है। 1962 के बाद पहली बार ऐसा लग रहा है कि राज्य की पारंपरिक द्रविड़ राजनीति को गंभीर चुनौती मिली है। जहां डीएमके अपने पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों के शानदार प्रदर्शन के चलते जीत की प्रबल दावेदार मानी जा रही थी, वहीं AIADMK भी जयललिता के निधन के बाद मजबूती से लड़ रही थी।




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