जब ममता ने कांग्रेस में की थी बगावत, समानांतर रैली; इनडोर-आउटडोर के झगड़े में सोनिया को पड़ा था झुकना
Sonia-Mamata Story: उस समय सोनिया सक्रिय राजनीति में नहीं आना चाहती थीं, जबकि ममता उन्हें पार्टी की कमान अपने हाथों में लेने और राजनीति में आने के लिए कई बार अनुरोध कर चुकी थीं। कल्याणी शंकर लिखती हैं कि कांग्रेस के इस झगड़े में तब सोनिया को एंट्री लेनी पड़ी थी।

बात अगस्त 1997 की है। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता (तब के कलकत्ता) में 8 से 10 अगस्त के बीच कांग्रेस का 80वां राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया गया था। तब कांग्रेस के अध्यक्ष सीताराम केसरी थे। उन्होंने ही इस अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। उस वक्त न तो केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और न ही देश के चार मुख्य महानगरों (दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कलकत्ता) और अगर बेंगलुरु और हैदराबाद को भी जोड़ लिया जाए, तो छह में से किसी में भी कांग्रेस की सरकार नहीं थी।
पार्टी के 'हाई कमान' ने इसी उम्मीद में कलकत्ता को राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए चुना था कि वहां का वामपंथ विरोधी मिजाज अधिवेशन को सफल बनाएगा, लेकिन कांग्रेस की युवा और तेज तर्रार नेता ममता बनर्जी ने अधिवेशन के दौरान ही विद्रोह कर दिया था और कांग्रेस में रहते हुए कांग्रेस पार्टी के भीतर ही अस्थिरता पैदा कर दी थी। दरअसल, हुआ यह था कि एक साल पहले ममता बनर्जी जो.उस समय बंगाल यूथ कांग्रेस की अध्यक्ष थी और उनकी नजर पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर थी लेकिन उन्हें दरकिनार कर सीताराम केसरी ने अपने चेहते सोमेन मित्रा को पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया था।
किसे तरबूज कहती थीं ममता?
ममता इस फैसले से खासा नाराज थी। उनकी नाराजगी की एक और बड़ी वजह यह थी कि सोमेन मित्रा के वामपंथियों के साथ मित्रवत संबंध थे। ममता उन्हें तरबूज कहती थीं, जो ऊपर से तो हरा दिखता है लेकिन अंदर से पूरा लाल है। 1997 में जब कोलकाता में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का 80वां अधिवेशन नेताजी इनडोर स्टेडियम में शुरू हुई तो ममता बनर्जी को लगा कि नेताजी इनडोर स्टेडियम के भीतर चल रहे आधिकारिक कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष (सोमेन मित्रा गुट) और केंद्रीय आलाकमान द्वारा उन्हें दरकिनार किया जा रहा है।
9 अगस्त 1997 को बगावत
इसके बाद ममता ने सत्र के दूसरे दिन 9 अगस्त 1997 को बगावत कर दी। अपने पारंपरिक 'स्ट्रीट-फाइटर' अंदाज में ने केवल पार्टी के आधिकारिक कर्यवाही को चुनौती दी बल्कि उस इनडोर स्टेडियम के बाहर खुले मैदान में एक विशाल, समानांतर आउटडोर रैली आयोजित कर दी। स्टेडियम के बाहर लाखों जमीनी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भीड़ जुटाकर ममता ने तब यह साबित कर दिया था कि असली जनसमर्थन किसके पास है।
इनडोर बनाम आउटडोर का विवाद
‘Pandora's Daughters में पत्रकार कल्याणी शंकर लिखती हैं, "मैं इस कार्यक्रम को कवर करने गई थी और 9 अगस्त 1997 के कांग्रेस अधिवेशन के दौरान जो कुछ हुआ वो मैंने खुद देखा। कांग्रेस में भी वर्किंग कमेटी के चुनाव थे। बैठक की अध्यक्षता सीताराम केसरी ने की, लेकिन असली खबर स्टेडियम के बाहर ममता द्वारा आयोजित एक रैली को लेकर थी।" कल्याणी शंकर ने लिखा है कि तब कांग्रेस में "इनडोर बनाम आउटडोर" एक बड़ा विवाद बन गया था।
सोनिया ने दिया था सात मिनट का छोटा भाषण
बता दें कि उस समय सोनिया गांधी सक्रिय राजनीति में नहीं आना चाहती थीं, जबकि ममता बनर्जी उन्हें पार्टी की कमान अपने हाथों में लेने और सक्रिय राजनीति में आने के लिए कई बार अनुरोध कर चुकी थीं। कल्याणी शंकर लिखती हैं कि कांग्रेस के इस "इनडोर बनाम आउटडोर" के झगड़े में तब सोनिया को एंट्री लेनी पड़ी थी। बकौल शंकर सोनिया ने तब पार्टी नेताओं के काफी मान-मनौव्वल के बाद इनडोर स्टेडियम में सिर्फ सात मिनट का छोटा भाषण दिया था लेकिन मंच पर वह नहीं बैठी थीं। सीताराम केसरी और उनके सलाहकारों ने ऐसा कांग्रेस पार्टी के मुख्य धड़े की तरफ सोनिया का झुकाव दर्शाने के लिए करवाया था। सोनिया को तब ममता की भी रैली को संबोधित करना था लेकिन पार्टी नेताओं के दबाव में उन्हें झुकना पड़ा था और वह ऐसा नहीं कर पाई थीं। इस झगड़े के बाद ममता बनर्जी को समझाने की भी कोशिशें हुईं लेकिन उन्होंने 1 जनवरी 1998 को अपनी अलग पार्टी तृणमूल कांग्रेस बना ली।




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