शुभेंदु अधिकारी का करती हूं सम्मान; TMC में बगावत के बीच महुआ मोइत्रा ने कह दी बड़ी बात
TMC में मची बगावत के बीच सांसद महुआ मोइत्रा ने इंटरव्यू में बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा है कि अगर इन विधायकों और सांसदों को कोई अभिषेक बनर्जी से कोई दिक्कत थी तो चुनाव से पहले क्यों नहीं पार्टी छोड़ी। शुभेंदु पर कहा कि मैं उनका सम्मान करती हूं, पर अब कोई संपर्क नहीं है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस टूटने लगी है। पहले विधानसभा में 60 से ज्यादा विधायकों ने बगावत की और अब 20 सांसदों ने अलग गुट बना लिया है। एक नई लिस्ट सामने आई है, जिसमें यूसुफ पठान, सायोनी घोष सरीखे नेता बागी वाली लिस्ट में दिख रहे हैं। इस बीच, महुआ मोइत्रा ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की एक तरह से 'तारीफ' की और कहा कि बागियों को उन्हीं की तरह पार्टी छोड़नी चाहिए। उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कहा कि मैं शुभेंदु का सम्मान करती हूं, उनके साथ मेरे बहुत अच्छे व्यक्तिगत संबंध हैं। हालांकि, जब से उन्होंने पार्टी छोड़ी, तब से उनसे मेरा कोई संपर्क नहीं रहा।
सवाल- सुष्मिता देव के पार्टी से इस्तीफा देने पर पहला रिएक्शन?
जवाब- लोग आजाद हैं। यह एक आजाद देश है। वह कांग्रेस में थीं। उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और हमारे साथ आ गईं। हमने उन्हें एक बार नहीं, बल्कि दो बार राज्यसभा की सीट दी। और चाहे जो भी कारण रहा हो... उन्हें ही इसका जवाब देना होगा कि वह क्यों चली गईं। उन्होंने जो किया, उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूं। हमारे 13 राज्यसभा सांसद हैं, जिनमें से सुखेंदु शेखर रॉय ने इस्तीफा दे दिया और अब सुष्मिता देव ने भी इस्तीफा दे दिया है। देखते हैं क्या होता है, क्या वे बीजेपी सांसद के तौर पर वापस आती हैं या बीजेपी बंगाल से उनकी जगह किसी और को मैदान में उतारती है।
आपने ट्वीट किया था कि लोकसभा के 16 सांसद दूसरी तरफ चले गए हैं। क्या अब यह संख्या 20 हो गई है, जैसा कि वे दावा कर रहे हैं?
उनके पास 16 सांसद हैं, लेकिन वे दावा कर रहे हैं कि उनके पास 20 हैं। अब यह साबित करने की जिम्मेदारी उन्हीं की है। अगर सच में उनके पास 20 सांसद होते, तो मुझे यकीन है कि कोई चिट्ठी जारी होती, हस्ताक्षर सामने आते और (बीजेपी के साथ) एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस होती। मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकती हूं कि उनके पास 20 सांसद नहीं हैं। दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए, सिर्फ लेजिस्लेटिव पार्टी (विधायक/सांसद दल) के नहीं, बल्कि पूरी पॉलिटिकल पार्टी (राजनीतिक दल) के दो-तिहाई सदस्यों को अलग होना पड़ता है। और सिर्फ अलग ही नहीं होना होता, बल्कि उन्हें बीजेपी में विलय भी करना होता है। तो पहली बात, आपके पास दो-तिहाई सदस्य होने चाहिए, 19 नहीं, बल्कि पूरी पॉलिटिकल पार्टी का दो-तिहाई हिस्सा,जो उनके पास नहीं है। दूसरी बात, अगर उनके पास 20 सांसद होते भी, तो उन्हें क्या हासिल होता? वे (TMC से) अलग होकर बैठ सकते थे। अलग बैठने के अलावा, लोकसभा या विधानसभा में किसी अलग गुट या ब्लॉक को मान्यता मिलने की कोई गुंजाइश नहीं है। वे बंगाल में खुद को 'काकोली कांग्रेस' या 'शताब्दी कांग्रेस' या 'बीजेपी की बी-टीम' कह सकते हैं और अलग बैठ सकते हैं। तो वे अलग बैठने और बीजेपी के पक्ष में वोट करने के लिए आजाद हैं। कोई उन्हें रोक नहीं सकता। लेकिन ऐसा करने पर उनका लोकसभा करियर खत्म हो जाएगा।
क्या आप सुष्मिता देव को राजनीतिक अवसरवादी कहेंगी?
यह सवाल आपको उनसे ही पूछना होगा। सुष्मिता देव मेरी दोस्त हैं। मैं उनके कारणों के बारे में कुछ नहीं कहूंगी। आपको उनसे खुद ही पूछना होगा।
अभी आपकी पार्टी का मूड कैसा है?
कुछ मामलों में, हम असल में खुश हैं क्योंकि 'शुद्धिकरण' यानी सफाई का काम हो रहा है। ममता दी, अपनी सूझ-बूझ और लीडरशिप के बावजूद, एक बहुत भावुक इंसान हैं जो लोगों से बहुत लगाव रखती हैं और लंबे समय तक वफादारी निभाती हैं। वहीं भाजपा में... सब कुछ बहुत बेरहम है। लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज जैसे लोगों को पूरी तरह से किनारे कर दिया गया। ममता दी बेरहम नहीं हैं। इसलिए, ऐसे कई बिल्कुल बेकार और बदतमीज लोग जो पिछले 15 सालों से ममता दी के सहारे आगे बढ़े... उन्हें ममता दी को पहले ही हटा देना चाहिए था।
क्या आप अभिषेक बनर्जी पर लग रहे भाई-भतीजावाद के आरोपों का जवाब देंगी?
आज क्रिकेट को फॉलो करने वाले हर व्यक्ति का मानना है कि जय शाह (बीसीसीआई में) इसलिए हैं क्योंकि वह सबसे होशियार हैं, क्या अभिषेक बनर्जी को 2014 में पहला टिकट इसलिए मिला था क्योंकि वह ममता बनर्जी के भतीजे थे? हां, मिला था। लेकिन क्या उसके बाद से वह तीन बार चुने नहीं गए, हमारी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव नहीं बने और पार्टी के लिए संगठनात्मक काम नहीं किया, पूरे राज्य का दौरा नहीं किया, संगठन को मजबूत नहीं किया? हां, उन्होंने यह सब किया है। वह 12 साल से वहां हैं। उन्होंने अपनी मेहनत से अपनी जगह बनाई है। ऐसा नहीं है कि उन्हें ऊपर से सीधे लाकर बिठा दिया गया और वह घर बैठे रहे और कुछ नहीं किया।
मैं भी नकारात्मक सोच रख सकती थी। वह मुझसे काफी छोटे हैं। मैंने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर स्वीकार किया है। मैं भी बागी हो सकती थी और वही कर सकती थी जो शुभेंदु अधिकारी ने किया। शुभेंदु ने कहा कि मैं अगला लीडर बनना चाहता हूं। जब तक अभिषेक वहां हैं, मुझे वह जगह नहीं मिलेगी। इसलिए, मैं अलग हो जाऊंगा। मैं भाजपा में चला जाऊंगा। ऐसा करने का एक साफ-सुथरा और पारदर्शी तरीका होता है। मैं उसका सम्मान करती हूं। मैं शुभेंदु (अधिकारी) का सम्मान करती हूं। उनके साथ मेरे बहुत अच्छे निजी संबंध रहे हैं, जो कभी खराब नहीं हुए। उनके जाने के बाद से मेरी उनसे कोई बातचीत नहीं हुई है, लेकिन उन्होंने जो कहा, उसे करके दिखाया। तो इनमें से कोई ऐसा क्यों नहीं करता? अगर इन 60 विधायकों में से किसी को भी अभिषेक से कोई दिक्कत थी, तो उन्होंने 2026 के चुनावों से पहले पार्टी क्यों नहीं छोड़ी, भाजपा में शामिल होकर भाजपा के टिकट पर चुनाव क्यों नहीं जीता?




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