TMC में हो रहा गजब का खेल, बढ़ गईं एकनाथ शिंदे की धड़कनें; कद घटने का सता रहा डर
बंगाल में TMC के भीतर मची बगावत का असर महाराष्ट्र की राजनीति पर पड़ सकता है। जानिए कैसे इस संकट से केंद्र में एकनाथ शिंदे की शिवसेना की मोलभाव करने की ताकत कमजोर हो सकती है और बीजेपी के साथ उनके समीकरण बदल सकते हैं।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर बगावत हो चुकी है। लेकिन इसका असर सिर्फ राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं रहने वाला है। राजनीतिक रूप से इसका बड़ा 'आफ्टरशॉक' महाराष्ट्र की राजनीति और खासकर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना पर पड़ सकता है। दरअसल, टीएमसी में मची इस उथल-पुथल से एनडीए के भीतर शिंदे की वह मोलभाव करने की ताकत कमजोर हो सकती है, जो उन्होंने अपनी पार्टी के जरिए केंद्र में बना रखी है।
दिल्ली में कम हो सकता है शिंदे का दबदबा
वर्तमान में महाराष्ट्र के भीतर बीजेपी राजनीतिक तौर पर अब शिंदे गुट पर पूरी तरह निर्भर नहीं है। राज्य में बीजेपी को सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के 41 विधायकों का भी मजबूत समर्थन हासिल है। ऐसे में एकनाथ शिंदे के पास गठबंधन में अपना दबदबा बनाए रखने का सबसे बड़ा हथियार दिल्ली (केंद्र) में था। लेकिन, माना जा रहा है कि अगर टीएमसी की टूट से बीजेपी को संसद में अतिरिक्त समर्थन मिल जाता है, तो केंद्र में शिंदे गुट के सांसदों की अहमियत घट सकती है। एक ऐसी बीजेपी जो संसद में सहयोगियों पर कम निर्भर होगी, वह राज्यों के सत्ता-समीकरणों में भी उन सहयोगियों के दबाव में कम आएगी।
आखिर शिंदे के 7 सांसदों की क्या है अहमियत?
2024 के लोकसभा चुनावों में जब बीजेपी 240 सीटों पर आ गई थी, तब एनडीए के हर सहयोगी दल की अहमियत संसद में काफी बढ़ गई थी। शिवसेना (शिंदे गुट) के 7 सांसदों ने वक्फ (संशोधन) बिल और 'वन नेशन, वन इलेक्शन' जैसे मोदी सरकार के कई अहम और बड़े प्रस्तावों का मजबूती से समर्थन किया है। इन्हीं सांसदों के समर्थन की वजह से एनडीए के एक प्रमुख सहयोगी दल के नेता के रूप में शिंदे का कद काफी बढ़ा हुआ था।
शिंदे और फडणवीस के बीच 'कोल्ड वॉर'
2022 में अविभाजित शिवसेना में टूट के बाद से ही एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस के बीच सह-अस्तित्व तो है, लेकिन यह रिश्ता बहुत सहज नहीं रहा है। बगावत के बाद बीजेपी ने शिंदे को सीएम जरूर बनाया, लेकिन सत्ता की साझेदारी को लेकर तनाव कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद यह असमानता और बढ़ गई। महायुति गठबंधन के भीतर कई बार टकराव देखने को मिला है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, नासिक और रायगढ़ जिलों के पालक मंत्री की नियुक्ति पर विवाद इतना गहरा गया था कि नियुक्तियों को होल्ड पर रखना पड़ा। कैबिनेट में जगह, राज्य के निगमों और बोर्डों में नियुक्तियों, फंड आवंटन और स्थानीय निकाय चुनाव की रणनीतियों को लेकर दोनों के बीच अक्सर मतभेद सामने आते रहे हैं।
शिवसेना नेताओं की लगातार यह शिकायत रही है कि बीजेपी शिवसेना के पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्रों में विस्तार कर रही है और स्थानीय नेताओं को अपने पाले में खींचने की कोशिश कर रही है। विधान परिषद (MLC) चुनावों में भी शिंदे ने अपनी संख्या बल से ज्यादा सीटों की मांग कर दी थी, जिसे सुलझाने के लिए सीधे केंद्रीय नेतृत्व को दखल देना पड़ा था।
'महाराष्ट्र मॉडल' अब खुद शिंदे पर पड़ेगा भारी?
एकनाथ शिंदे का राजनीतिक उभार भी एक क्षेत्रीय पार्टी में हुई बगावत के कारण ही संभव हो पाया था। इस 'महाराष्ट्र मॉडल' ने महाराष्ट्र और केंद्र दोनों जगह बीजेपी को मजबूत किया और एक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी को कमजोर कर दिया। अब एक और क्षेत्रीय पार्टी (टीएमसी) में इसी तरह की बगावत का नतीजा खुद शिंदे के लिए बिल्कुल उलटा साबित हो सकता है।
सीधे हाईकमान से संपर्क साधने की ताकत पर असर
जब भी महाराष्ट्र में गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे, कैबिनेट विस्तार या मंत्रियों की नियुक्ति को लेकर तनाव की स्थिति बनी, तो एकनाथ शिंदे ने सीधे दिल्ली जाकर आलाकमान से मुलाकात की। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह सिर्फ सामान्य शिष्टाचार मुलाकातें नहीं थीं। ये मुलाकातें दिखाती थीं कि शिंदे के पास महाराष्ट्र बीजेपी के नेतृत्व को दरकिनार कर अपनी बात सीधे पार्टी के केंद्रीय कमांड तक पहुंचाने की ताकत है। चूंकि बीजेपी नेतृत्व संसद में शिंदे के 7 सांसदों को महत्व देता था, इसलिए शिंदे को मुंबई और नागपुर से इतर एक वैकल्पिक 'पावर सेंटर' मिल गया था। टीएमसी की बगावत अब इसी समीकरण को बदलने का खतरा पैदा कर रही है।




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