How much money does TMC have Mamata Banerjee faces challenge of saving party coffers TMC के अकाउंट में कितना पैसा? ममता के सामने खजाना बचाने की चुनौती, दफ्तर पर भी संकट, India News in Hindi - Hindustan
More

TMC के अकाउंट में कितना पैसा? ममता के सामने खजाना बचाने की चुनौती, दफ्तर पर भी संकट

Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस समय उसी संकट से जूझ रहीं हैं, जिससे कभी इंदिरा गांधी जूझी थीं। ममता के सामने इस समय पार्टी का फंड और सिंबल बचाने की बड़ी चुनौती है।

Fri, 12 June 2026 08:41 AMHimanshu Jha लाइव हिन्दुस्तान, कोलकाता।
share
TMC के अकाउंट में कितना पैसा? ममता के सामने खजाना बचाने की चुनौती, दफ्तर पर भी संकट

Mamata Banerjee and TMC: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने न केवल अपनी चार दशकों की राजनीतिक विरासत को बचाने की चुनौती है, बल्कि पार्टी के खजाने और चुनावी सिंबल बरकरार रखने का भी संकट है। बंगाल की सत्ता में 15 साल रहने के दौरान टीएमसी ने जो विशाल वित्तीय साम्राज्य खड़ा किया था, उस पर अब बड़ा सवालिया निशान लग गया है। आखिर टीएमसी के खजाने पर किसका हक होगा, ममता बनर्जी का या बागी गुट का?

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस देश की 36 क्षेत्रीय पार्टियों में तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के बाद दूसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली पार्टी बनकर उभरी है। वित्तीय वर्ष 2024-25 के आयकर रिटर्न में टीएमसी ने अपनी कुल कमाई 219.35 करोड़ रुपये घोषित की थी। पिछले साल पार्टी को 184.08 करोड़ रुपये का चंदा मिला जो सभी क्षेत्रीय दलों में सबसे अधिक था। इसके अलावा फिक्स डिपॉजिट के ब्याज से ही पार्टी ने 33.685 करोड़ रुपये कमाए थे। इससे पहले 2023-24 में पार्टी की कमाई 646.293 करोड़ रुपये थी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक घोषित किए जाने से पहले अप्रैल 2019 से जनवरी 2024 के बीच टीएमसी ने 1,609.5 करोड़ रुपये के बॉन्ड भुनाए थे। वित्तीय वर्ष 2025-26 का ऑडिट अभी होना बाकी है, लेकिन इस अकूत संपत्ति पर अब मालिकाना हक की जंग छिड़ सकती है।

विधायकों और सांसदों के आंकड़े दे रहे गवाही

पार्टी के भीतर बगावत के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इस साल अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव में टीएमसी के 80 विधायक जीते थे, जिनमें से दो को निष्कासित कर दिया गया और 56 अन्य विधायकों ने निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने के लिए समर्थन दे दिया है। संसद में भी पार्टी बिखर रही है। राज्यसभा में टीएमसी के 13 सांसदों में से सुखेन्दु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक के इस्तीफे के बाद संख्या घटकर 10 रह गई है। वहीं लोकसभा में भी 28 में से 19 सांसदों के अलग गुट बनाने की खबरें हैं।

इंदिरा गांधी जैसा संकट

ममता बनर्जी आज जिस दौर से गुजर रही हैं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी 1969 और 1978 में दो बार ऐसी ही हालात देखी थी। 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ तो इंदिरा गांधी को अपनी पार्टी का पुराना सिंबल दो बैलों की जोड़ी और दफ्तर की संपत्ति गंवानी पड़ी थी। बाद में गाय-बछड़ा सिंबल के साथ उन्होंने वापसी की। इसके बाद 1978 में जब तत्कालीन गृह मंत्री कासु ब्रह्मानंद रेड्डी ने इंदिरा गांधी को निष्कासित किया तो चुनाव आयोग ने गाय-बछड़ा सिंबल भी फ्रीज कर दिया था। हालांकि, टीएमसी के किसी भी बागी गुट ने अभी तक चुनाव आयोग (EC) का दरवाजा नहीं खटखटाया है। चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत चुनाव आयोग को यह तय करने का अधिकार है कि पार्टी में टूट की स्थिति में असली पार्टी कौन सी है।

दफ्तर का भी संकट

टीएमसी का कोलकाता के तोपसिया स्थित पुराना दफ्तर अभी मरम्मत के दौर से गुजर रहा है। पिछले तीन साल से जिस किराए के दफ्तर से पार्टी चल रही थी, उसके मालिकों ने भी अब टीएससी को परिसर खाली करने के लिए कह दिया है। इस राजनीतिक भूचाल के बीच एकमात्र कानूनी कदम ममता बनर्जी के करीबी शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने उठाया है। उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता नियुक्त करने के बागी गुट के फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विवेक तन्खा का कहना है कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) की भावना लगभग खत्म हो चुकी है। अब संसदीय दल या विधायक दल में टूट को ही असली पार्टी की टूट मान लिया जाता है, जैसा हमने पहले महाराष्ट्र और गोवा में देखा है। ऐसे में ममता बनर्जी के लिए यह लड़ाई उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन परीक्षा साबित होने वाली है।