क्या है कांचीपुरम मंदिर संप्रदाय विवाद? हिन्दुओं का झगड़ा सुलझाने CJI ने किसे नियुक्त किया मध्यस्थ
जब मामला SC में आया तो पीठ ने बार-बार कहा कि रामानुजाचार्य के अनुयायियों के बीच का विवाद सांप्रदायिक टकराव में नहीं बदलना चाहिए। अदालत ने कहा कि यह मुद्दा शत्रुतापूर्ण कानूनी फैसले के बजाय भाईचारे और सुलह की मांग करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल को तमिलनाडु के कांचीपुरम में श्री देवराज स्वामी मंदिर में पूजा के दौरान मंत्र पाठ और प्रबंध को लेकर दो संप्रदायों- थेंगलई (दक्षिणी संप्रदाय) और वडगलई (उत्तरी संप्रदाय) वैष्णव समुदायों के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने में मदद करने के लिए मध्यस्थ नियुक्त किया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने रिटायर्ड जस्टिस कौल को मध्यस्थता प्रक्रिया में सहायता के लिए प्रासंगिक भाषा, मंदिर के अनुष्ठान और धार्मिक परंपराओं के जानकार दो अतिरिक्त व्यक्तियों को साथ जोड़ने की अनुमति दी है। जस्टिस कौल 2023 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे।
क्या है कांचीपुरम मंदिर संप्रदाय विवाद?
कांचीपुरम का 120 साल पुराना मंदिर संप्रदाय विवाद तमिलनाडु के वरदराज पेरुमल मंदिर में वडगलई (Vadakalai) और थेंगलाई (Thenkalai) वैष्णव संप्रदायों के बीच पूजा और मंत्रोच्चार (स्तोत्र) के अधिकारों को लेकर है। यह विवाद अक्सर कानुम पोंगल जैसे त्यौहारों के दौरान मंत्रोच्चार की प्राथमिकता को लेकर झड़प में बदल जाता है। यह विवाद इस मुख्य बिंदु पर केंद्रित है कि क्या वडगलई संप्रदाय के सदस्य मंदिर पूजा के आधिकारिक अनुष्ठान वाले भाग के दौरान अपना स्वयं का आह्वान (प्रार्थना/मंत्र) शुरू कर सकते हैं, जिसे ऐतिहासिक रूप से मिरासी अधिकार प्रणाली के तहत थेंगलाई पदधारक संपन्न कराते रहे हैं।
HC ने थेंगलाई के एकाधिकार को बरकरार रखा
थेंगलाई संप्रदाय खुद को पारंपरिक रूप से मंदिर के पूजा अधिकारों (मिरासी अधिकार) का हकदार मानता है, जबकि वडगलई संप्रदाय भी समान अधिकारों का दावा करता है। इसके अलावा थेंगलाई संप्रदाय तमिल भजनों (दिव्य प्रबन्धम) को प्राथमिकता देता है, जबकि वडगलई संप्रदाय संस्कृत स्तोत्रों के पाठ पर जोर देता है। यानी मंत्रोच्चार पर भी दोनों समुदायों के बीच टकराव है। मद्रास हाईकोर्ट ने थेंगलाई के एकाधिकार को बरकरार रखा था।
शीर्ष अदालत का हस्तक्षेप मद्रास हाई कोर्ट के दिसंबर 2025 के उसी फैसले की पृष्ठभूमि में आया है, जो 'राजहंसम बनाम नारायणन' मामले में दिया गया था। उस मामले में जस्टिस आर सुरेश कुमार और जस्टिस एस सुंदर की खंडपीठ ने श्री देवराज स्वामी मंदिर में आधिकारिक औपचारिक पूजा, जिसे 'मिरासी अधिकार' कहा जाता है, करने के लिए थेंगलाई समुदाय के अनन्य अधिकारों को बरकरार रखा था।
'मंत्र' और 'प्रबंधम' पढ़ने की अनुमति खारिज
उच्च न्यायालय ने वडगलई सदस्यों की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिनमें औपचारिक पूजा के दौरान अपना स्वयं का 'मंत्र' और 'प्रबंधम' पढ़ने की अनुमति मांगी गयी थी। उच्च न्यायालय ने कहा कि इस तरह के प्रयासों से स्थापित न्यायिक आदेशों में बाधा आयेगी और संभावित रूप से सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ सकती है। अदालत ने यह भी गौर किया कि वडगलई संप्रदाय के व्यक्तिगत सदस्य और अन्य श्रद्धालु अध्यापक पदधारकों के पढ़े जा रहे पाठ को दोहराकर पूजा में शामिल होने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन वे आधिकारिक अनुष्ठानों के दौरान स्वतंत्र रूप से पाठ नहीं कर सकते।
जब यह मामला शीर्ष अदालत में आया तो पीठ ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि रामानुजाचार्य के अनुयायियों के बीच का विवाद सांप्रदायिक टकराव में नहीं बदलना चाहिए। अदालत ने कहा कि यह मुद्दा शत्रुतापूर्ण कानूनी फैसले के बजाय भाईचारे, सह-अस्तित्व और सुलह की मांग करता है। इसके बाद दोनों पक्षों के वकील इस बात पर सहमत हुए कि इस विवाद का हल बीच-बचाव से निकाला जाना चाहिए और उन्होंने मंदिर के रस्मों, तमिल धार्मिक रीति-रिवाजों और इस मुद्दे पर ऐतिहासिक फैसलों से वाकिफ एक पूर्व न्यायाधीश की नियुक्ति का सुझाव दिया।
जस्टिस किशन कौल को क्यों बनाया मध्यस्थ?
इस संदर्भ में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल का नाम यह देखते हुए प्रस्तावित किया गया कि वे मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे हैं और राज्य की संस्थागत और सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित हैं। पार्टियों के बीच आम सहमति दर्ज करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि मध्यस्थता में मंदिर में पूजा की बारीकियों, धार्मिक अधिकारों और मौजूदा न्यायिक आदेशों को समझने पर ध्यान देना चाहिए, न कि कानून के तय सवालों को फिर से खोलना चाहिए।
अदालत ने निर्देश दिया कि मघ्यस्थता होने तक आज की स्थिति को सख्ती से बनाए रखा जाये। इसने यह भी कहा कि मंदिर परिसर के अंदर पुलिस की मौजूदगी नहीं होनी चाहिए, खासकर यह देखते हुए कि ऐसा दखल 'बहुत बुरा' होगा और शांति बनाये रखने के बजाय स्थिति को और खराब कर सकता है। पीठ ने आगे निर्देश दिया कि कोई भी संप्रदाय ऐसा कोई कदम न उठाये जिससे मध्यस्थता प्रक्रिया के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा हो। पक्षों को यह स्वतंत्रता दी गयी है कि यदि उनके बीच कोई समझौता हो जाता है या यदि राज्य सरकार का किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है तो वे मामले का उल्लेख अदालत के समक्ष कर सकते हैं।




साइन इन