What is CAPF Promotion Dispute? Why New Bill Regarding Appointment of IPS Officers to Top Posts in CRPF BSF Spotlight Explainer: क्या है CAPF पदोन्नति विवाद? चर्चा में क्यों शीर्ष पदों पर IPS की नियुक्ति का नया विधेयक, India News in Hindi - Hindustan
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Explainer: क्या है CAPF पदोन्नति विवाद? चर्चा में क्यों शीर्ष पदों पर IPS की नियुक्ति का नया विधेयक

CAPF Promotion Dispute: शीर्ष अदालत ने पिछले साल मई में CAPF अधिकारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए CAPF को 'संगठित ग्रुप-A सेवा' (OGAS) का दर्जा दिया और उन्हें IPS और IRS अफसरों के समान दर्जा देने की बात कही थी।

Mon, 16 March 2026 04:16 PMPramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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Explainer: क्या है CAPF पदोन्नति विवाद? चर्चा में क्यों शीर्ष पदों पर IPS की नियुक्ति का नया विधेयक

CAPF Promotion Dispute: केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) में शीर्ष पदों पर IPS अफसरों के डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। लगभग 10 लाख से अधिक जवानों वाली इन सुरक्षा एजेंसियों में कार्यरत करीब 13,000 अधिकारियों का आरोप है कि दशकों से उनके अपने संगठनों में उच्च पदों पर नियुक्ति के अवसर उनसे छीन लिए गए हैं। दरअसल, CAPF अधिकारियों का आरोप है कि उनके बलों (CRPF, BSF, ITBP, CISF, SSB) के वरिष्ठ पदों (IG, DIG, DG) पर IPS अधिकारियों को डेपुटेशन पर बैठा दिया जाता है, जिससे खुद कैडर के अधिकारियों के प्रमोशन के रास्ते बंद हो जाते हैं।

ये बल जम्मू-कश्मीर की नियंत्रण रेखा, लद्दाख में चीन सीमा, देश के हवाई अड्डों, परमाणु प्रतिष्ठानों और नक्सल प्रभावित जैसे क्षेत्रों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनका आरोप ये भी है कि CAPF के कैडर अधिकारियों को एक ही रैंक पर 15-20 साल तक रुकना पड़ता है। उदाहरण के लिए, जहाँ IPS अधिकारी 13-14 साल में उच्च रैंक पा लेते हैं, वहीं CAPF अधिकारियों को डिप्टी कमांडेंट बनने में ही 10-15 साल लग जाते हैं। कई अधिकारी इस अन्याय के विरोध में VRS (स्वैच्छिक सेवानिवृति) का रास्ता चुन रहे हैं।

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दशकों पुरानी व्यवस्था

बता दें कि CAPF के इन संगठनों में डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (DIG) से लेकर डायरेक्टर जनरल (DG) तक के कई शीर्ष पद पारंपरिक रूप से भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति (deputation) पर दिए जाते रहे हैं। यह व्यवस्था 1950 के दशक में एक अस्थायी उपाय के रूप में शुरू की गई थी, जब CAPF का विस्तार हो रहा था और उसके पास पर्याप्त वरिष्ठ अधिकारी नहीं थे। हालांकि समय के साथ CAPF में अपना पूरा कैडर विकसित हो चुका है, बावजूद इसके यह अस्थायी व्यवस्था समाप्त नहीं हो सकी है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

ऐसे में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा। शीर्ष अदालत ने पिछले साल मई में CAPF अधिकारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए CAPF को 'संगठित ग्रुप-A सेवा' (OGAS) का दर्जा दिया और उन्हें IPS और IRS अफसरों के समान दर्जा देने की बात कही थी इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने और आदेश दिया कि वरिष्ठ पदों पर IPS अफसरों की प्रतिनिय़ुक्ति धीरे-धीरे कम की जाए। हालांकि, सरकार ने इस फैसले के खिलाफ SC मे पुनर्विचार याचिका दायर की, जिसे अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बावजूद फैसले का पूर्ण क्रियान्वयन अभी तक नहीं हो पाया है और इस मामले में अवमानना याचिकाएं भी दायर की गई हैं।

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नए विधेयक से और बढ़ा विवाद

इसी बीच, केंद्र सरकार 'केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक' लेकर आई है, जिसे कैबिनेट की मंजूरी मिल चुकी है और चालू बजट सत्र में संसद में पेश किए जाने की संभावना है। आलोचकों का कहना है कि यह बिल सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दरकिनार कर वरिष्ठ पदों पर IPS अधिकारियों की नियुक्ति को स्थायी रूप से वैध बनाने की कोशिश है और यह विधेयक CAPF में DIG और IG स्तर पर IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति जारी रखने का रास्ता बनाए रखता है। विरोध करने वाले अधिकारियों का कहना है कि यह वही व्यवस्था है जिसे सुप्रीम कोर्ट समाप्त करने की बात कह चुका है।

CAPF Promotion dispute

सरकार का पक्ष क्या?

सरकार का तर्क है कि IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय बना रहता है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में व्यापक अनुभव का लाभ मिलता है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि अन्य सुरक्षा संगठनों में ऐसा नहीं है। उदाहरण के तौर पर Railway Protection Force और Indian Coast Guard अपने ही कैडर के अधिकारियों के नेतृत्व में सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं और उन्हें बाहरी सेवाओं पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। विश्लेषकों के अनुसार यह मुद्दा केवल पदोन्नति का नहीं बल्कि संस्थागत स्वायत्तता और कैडर सम्मान से जुड़ा हुआ है।

राजनीति हुई तेज

अब इस मुद्दे पर सियासत भी जोर मार रही है। पिछले दिनों सपा सांसद रामगोपाल यादव ने भी इस मुद्दे को राज्यसभा में उठाया और CAPF अफसरों को न्याय दिलाने की मांग की। वहीं राज्यसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सोमवार (16 मार्च) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर CAPF अफसरों को न्याय सुनिश्चित कराने की मांग की है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और नए विधेयक के बीच संतुलन कैसे बनाती है और CAPF अधिकारियों की लंबे समय से चली आ रही मांगों का समाधान कैसे निकलता है।