बंगाल में मुस्लिम बहुल सीटों पर कैसे जीती BJP, बंटवारे ने TMC का किया बड़ा नुकसान
पहले अल्पसंख्यक वोट एकजुट होकर टीएमसी को मजबूती देते थे। 2021 में इन 43 सीटों (मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर) में तृणमूल ने 35 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को सिर्फ 8 मिलीं। मुर्शिदाबाद में मुस्लिम आबादी दो-तिहाई से ज्यादा है, टीएमसी को यहां 20 में से 20 सीटें मिली थीं।

2026 के विधानसभा चुनाव ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को काफी बदल दिया है। भाजपा ने न केवल जीत हासिल की बल्कि राज्य की सत्ता पर में भारी बहुमत के साथ दस्तक दी। 2021 में जहां तृणमूल कांग्रेस ने 215 सीटें जीती थीं और भाजपा को 77 सीटों पर रोक दिया था, वहीं 2026 में भाजपा ने 206 सीटें हासिल कर इतिहास रच दिया, जबकि टीएमसी मात्र 80 सीटों पर सिमट गई। सबसे अधिक हैरान करने वाली बात मुस्लिम बहुल और मुस्लिम प्रभाव वाले क्षेत्रों में भाजपा की सफलता थी। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में दशकों से अल्पसंख्यक वोट टीएमसी की ताकत थे, वहां भाजपा ने ममता बनर्जी के किले को भेद दिया। यह जीत अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे और भाजपा की रणनीति का नतीजा बताई जा रही है।
पहले अल्पसंख्यक वोट एकजुट होकर टीएमसी को मजबूती देते थे। 2021 में इन 43 सीटों (मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर) में तृणमूल ने 35 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को सिर्फ 8 मिलीं। मुर्शिदाबाद में मुस्लिम आबादी दो-तिहाई से ज्यादा है, टीएमसी को यहां 20 में से 20 सीटें मिली थीं। लेकिन 2026 में अल्पसंख्यक वोट बंट गए। मुस्लिम मतदाता अब टीएमसी, कांग्रेस, सीपीआई(एम), इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF), हुमायूं कबीर की एजेयूपी और अन्य छोटे दलों में बंट गए। इससे टीएमसी की एकाधिकार वाली स्थिति टूट गई। भाजपा को पूरे मुस्लिम वोट की जरूरत नहीं पड़ी, बस विपक्षी वोटों के विभाजन ने उसके पक्ष में समीकरण बदल दिए।
वोटों का किस तरह हुआ बंटवारा
मुर्शिदाबाद इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण बना। 2021 में टीएमसी की 20 सीटों वाली ताकत 2026 में काफी कमजोर हुई। हुमायूं कबीर की एजेयूपी ने रेजीनगर और नौदा जैसी सीटों पर जीत दर्ज की और टीएमसी के वोट काटे। कांग्रेस ने रानीनगर में वापसी की तो सीपीआई(एम) ने डोमकल में अच्छा प्रदर्शन किया। मालदा में कांग्रेस की मामूली वापसी ने भी TMC के मार्जिन घटाए। इंग्लिश बाजार में भाजपा उम्मीदवार अम्लान भदुड़ी ने 93 हजार वोटों से जीत हासिल की। उत्तर दिनाजपुर में एसआईआर, वोटर लिस्ट की जांच और ओबीसी-राजबंशी मुद्दों ने हिंदू वोटों को एकजुट किया, जबकि कांग्रेस-वामपंथी वोटों ने टीएमसी को नुकसान पहुंचाया।
ममता बनर्जी की महिलाओं पर आधारित योजनाएं जैसे लक्ष्मी भंडार का असर भी कम हुआ। भाजपा की अन्नपूर्णा भंडार योजना ने इसे चुनौती दी। आरजी कर मामले, भर्ती घोटाले, भ्रष्टाचार और सिंडिकेट राजनीति से टीएमसी पर एंटी-इनकंबेंसी हावी हुई। भाजपा ने बूथ स्तर पर संगठन मजबूत किया। शुभेंदु अधिकारी और सुकांत मजूमदार की भूमिका अहम रही। ममता बनर्जी को भवानीपुर में भी हार का सामना करना पड़ा। 2026 का चुनाव साबित करता है कि अल्पसंख्यक वोट अब टीएमसी का वीटो पावर नहीं रह गया है। वोटों का बंटवारा, स्थानीय मुद्दे और भाजपा की रणनीति ने बंगाल का चुनावी मानचित्र बदल दिया है।




साइन इन