कैडर, नेटवर्क और रणनीति: RSS ने लिखी भाजपा की बंगाल विजय की पटकथा, जमीन पर जमकर हुआ काम
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम में भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत मिला है। केंद्र में सत्ता में बैठी पार्टी ने पहली बार अपने राजनीतिक पूर्वज श्यामा प्रसाद मुखर्जी की धरती पर जीत हासिल की है। संघ ने भी इस जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

West Bengal election results: पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की है। दशकों तक लेफ्ट और फिर पिछले 15 वर्ष से टीएमसी के कब्जे में रहे इस राज्य को हासिल करने के लिए भाजपा और उसके सहयोगियों ने एक दशक तक मेहनत की है। पिछले कई दशकों से बंगाल की राजनीतिक बिसात पूरी तरह से पार्टी कैडर के आधार पर बिछी हुई थी। धार्मिक आधार पर लोगों के बीच में ज्यादा एकजुटता बहुत कम थी। ऐसे में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को इस राज्य को तैयार करने के लिए एक दशक से ज्यादा का समय लग गया। संघ ने भाजपा की जीत को पुख्ता करने के लिए जमीनी स्तर पर जमकर काम किया।
बंगाल की राजनीति को देखें तो यहां पर पहले कांग्रेस का वर्चस्व रहा। उसके बाद सत्ता की चाबी लेफ्ट पार्टियों के हाथों में आ गई। लगभग चार दशकों की सत्ता के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने लेफ्ट का किला गिरा दिया और फिर 15 साल तक सत्ता संभाली। कल भाजपा ने ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर दिया। इस बदलाव के पीछे एक नहीं कई कारण है। बंगाल में जो कुछ हुआ वह केवल एक चुनावी मुकाबना नहीं था बल्कि एक गहरी सामाजिक परियोजना का परिणाम था।
संघ ने लगातार बंगाल में काम करके राज्य में मौजूद हिंदू समुदाय को एकजुट करने का काम किया। संघ की संगोष्ठी और बैठकों ने बंगाली हिंदुओं के मन में मौजूद जातिगत, क्षेत्रीय, वर्ग के विभाजन को कम करने का प्रयास किया। इस चुनाव के नतीजे साफ तौर पर दिखाते हैं कि बंगाली हिंदुओं ने इस बार एकजुट होकर भाजपा के पक्ष में वोट किया है।
संघ ने लाखों मतदाताओं से किया संपर्क
2021 विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पहले के मुकाबले अपने प्रदर्शन में सुधार किया। इस समय भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने जनता के बीच में अपनी पैठ बनाई थी। इस चुनाव में जो कमियां रह गईं उसकी कसर 2026 के विधानसभा चुनाव के पहले पूरी कर ली गई। संघ ने बड़े पैमाने पर सभी विधानसभा सीटों पर लोगों से संपर्क किया। शांति से अपने काम को करने के लिए पहचाने जाने वाले संघ ने पूरे राज्य में करीब 2 लाख मतदाता जागरुक सभाएं कीं। इन सभाओं में छात्रों, आदिवासियों, महिलाओं सहित समाज के सभी वर्गों से संपर्क साधा गया।
शांति के साथ काम करता रहा संघ
भाजपा का कैडर जहां शोर के साथ राज्य में अपना प्रचार कर रहा था। उसके दूसरी तरफ संघ के स्वयं सेवक शांति के साथ अपना काम कर रहे थे। संघ की इन सभाओं में न तो बड़े-बड़े भाषण हुए और न ही बड़ी रैलियां। इन सब के बजाय एक सुनियोजित और लोकमत को परिवर्तित करने वाली सभाओं का आयोजन किया गया।
बांग्लादेश की घटनाओं ने भी निभाई भूमिका
संघ ने पश्चिम बंगाल के प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में 700 से ज्यादा सभाएं की। इन सभाओं ने प्रदेश की जनता को एक नया विकल्प दिखाया। इन सभाओं ने बंगाल चुनाव को एक सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बदलकर बंगाली हिंदुओं के अस्तित्व की लड़ाई बना दिया। बंगाल में शांत रहकर सभाओं के जरिए लोगों को समझाई गई इन बातों ने उनके मन पर बेहतर प्रभाव डाला। इससे आम बंगाली के मन में यह साफ हो गया कि हिंदु एकीकरण का यह विचार उनके ऊपर थोपा नहीं गया, बल्कि यह उनकी जरूरत है। दूसरी तरफ बांग्लादेश में हुई घटनाओं और बांग्लादेशी चुनाव में सीमाई क्षेत्रों में जमात के बढ़ते प्रभाव ने हिंदुओं को और भी ज्यादा एकजुट कर दिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने हिंदुओं को जातिगत सीमाओं से परे होकर एकीकरण की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित किया। यह पहली बार था कि बंगाली हिंदुओं ने एकजुट होकर मतदान किया हो।
पश्चिम बंगाल संघ का पुराना सपना
भाजपा के पुराने रूप भारतीय जनसंघ की स्थापना पश्चिम बंगाल से आए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही की थी। कश्मीर के मुद्दे पर भाजपा का नारा, 'जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है।' ने घर-घर में पहचान बनाकर रखी थी। लेकिन भाजपा और संघ के मन में यह कसक हमेशा से थी कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की धरती पर आजादी के बाद से लेकर अभी तक वह सत्ता हासिल नहीं कर पाए हैं। इसलिए, संघ और भाजपा ने और भी ज्यादा मेहनत के साथ इस पर काम किया।
सोमवार को जब नतीजे सामने आए, तो दिल्ली के भाजपा कार्यालय में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगाई गईं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने विजयी भाषण के दौरान कहा, "श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आत्म को अंततः शांति मिल गई है।"
आजाद भारत के इतिहास में पश्चिम बंगाल की राजनीति एक वंश की तरह आगे बढ़ती है। एक बार जो सत्ता में बैठ जाता है। उसे हटाना आसान नहीं होता पहले कांग्रेस फिर लेफ्ट और उसके बाद टीएमसी ने लगातार सत्ता का सुख भोगा है। अब भाजपा ने बंगाली नागरिकों के बीच में सामाजिक चेतना का विकास करके अपनी जमीन को और भी ज्यादा मजबूत कर लिया है। अब इस राज्य में भाजपा को हराने के लिए राजनीतिक विरोधियों को केवल एक राजनीतिक सत्ता नहीं बल्कि एक पुनर्गठित सामाजिक संरचना का सामना करना होगा।




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