दुनिया भर में बढ़ी कानपुर के पैराशूट की मांग, रक्षा मंत्रालय ने गिनाईं इसकी खूबियां
कानपुर की ऑर्डिनेंस पैराशूट फैक्ट्री में बने पैराशूट पीटीए-एम की मांग दुनिया भर में बढ़ी है। रक्षा कंपनी ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड की उत्पादन इकाई ओपीएफ का यह पैराशूट आधुनिक तकनीक और सुविधाओं से लैस है। रक्षा मंत्रालय ने एक्स पर इस पैराशूट की खूबियां बताई हैं।

UP News: कानपुर की ऑर्डिनेंस पैराशूट फैक्ट्री में बने पैराशूट पीटीए-एम की मांग दुनिया भर में बढ़ी है। विश्व के अलग-अलग देशों के बीच सामरिक अभियानों के दौरान सैनिकों की हवाई क्षेत्र से सुरक्षित लैंडिंग में रक्षा कंपनी ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड की उत्पादन इकाई ओपीएफ का यह पैराशूट आधुनिक तकनीक और सुविधाओं से लैस है। रक्षा मंत्रालय ने एक्स पर इस पैराशूट की खूबियां बताई हैं।
पैराशूट टैक्टिकल असॉल्ट मेन (पीटीए-एम) अगली पीढ़ी का सैन्य पैराशूट है। इस पैराशूट को स्थिर तरीके से उतरने के लिए डिजाइन किया गया है, जिससे सैनिकों को कठिन युद्धक्षेत्र की परिस्थितियों में भी सुरक्षित उतारा जा सकता है। इसमें एक त्वरित तैनाती प्रणाली है, जो यह सुनिश्चित करती है कि कूदने के बाद पैराशूट जल्दी खुल जाए, जिससे कम ऊंचाई पर संचालन के दौरान जोखिम कम हो जाता है। बेहतर वायु प्रवाह के लिए एयर स्कूप्स, कैनोपी संबंधी समस्याओं को रोकने के लिए एंटी-इनवर्जन नेटिंग, नियंत्रित लैंडिंग के लिए कुशल ड्रैग सिस्टम है।
ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड के सीएमडी एमसी बालासुब्रमण्यम ने बताया कि ओपीएफ में बना पैराशूट टैक्टिकल असॉल्ट मेन सामरिक अभियानों के दौरान सैनिकों की सुरक्षित और सटीक लैंडिंग कराने वाला बेहतरीन पैराशूट है। एशिया की सबसे बड़ी पैराशूट निर्माण करने वाली फैक्ट्री में बने पैराशूटों की मांग दुनिया भर से आ रही है और इनकी आपूर्ति भी हो रही है। आत्म निर्भर भारत मिशन का प्रतीक पीटीए-एम दुनिया के कई देशों को भा रहा है।
इस पैराशूट की खासियत जानिए
5.48 मीटर प्रति सेकंड की गति से 150 किलो वजन से उतारने में सक्षम
18 हजार से 300 फीट की ऊंचाई से कूदने में सक्षम और सुरक्षित
100 बार नीचे उतरने में यह पैराशूट पूरी तरह सक्षम, 13 साल करता काम
नायलॉन, रिपस्टॉक फैब्रिक से बने पैराशूट का छत्र व्यास आठ मीटर
हवाई हमले, आपातकालीन सैन्य तैनाती के दौरान विशेष संचालन
कानपुर के एसएएफ में बन रही असॉल्ट राइफल एके-203
वहीं, कानपुर की स्माल आर्म्स फैक्ट्री (एसएएफ) में बन रही एक मिनट में 600 गोलियां दागने वाली अत्याधुनिक असॉल्ट राइफल एके-203 का पूरी तरह स्वदेशीकरण हो चुका है। रूस के सहयोग से बन रही यह राइफल अभी तक दोनों देशों के पार्ट्स और तकनीक की मदद से बन रही थी, लेकिन अब एके-203 शत प्रतिशत स्वदेशी हो चुकी है। स्वदेशी राइफल को सेना को देने से पहले तीन चरणों में ट्रायल होना है। पहला विंटर ट्रायल इसी फरवरी माह में हिमाचल प्रदेश के सुमडो में होगा। सेना, एसएएफ और एके-203 को असेंबल करने वाली अमेठी की ऑर्डिनेंस फैक्ट्री प्रोजेक्ट कोरवा की टीम की मौजूदगी में होगा। तपिश भरी गर्मी में हथियार का ट्रायल राजस्थान और बारिश का ट्रायल दक्षिण भारत में होगा।
रूस और भारत के ज्वाइंट वेंचर आईआरआरपीएल ने एके-203 को बनाने की शुरुआत की। इसका चरणबद्ध तरीके से स्वदेशीकरण किया गया। असॉल्ट राइफल को बनाने का काम एसएएफ में जुलाई 2024 में शुरू हुआ। इसके पार्ट्स पहले 85 प्रतिशत रूस और 15 प्रतिशत भारत के थे। अगले चरणों में रूस की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत फिर 30 प्रतिशत हुई और भारत की 30 प्रतिशत से 70 प्रतिशत तक हुई। अब एके-203 को शत प्रतिशत स्वदेशी पार्ट्स का प्रयोग कर बनाया गया है।




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