आसान नहीं TMC का कांग्रेस में विलय! राह में '10वीं अनुसूची' का रोड़ा, दीदी के पास है जादुई आंकड़ा?
ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कांग्रेस में विलय की अटकलें तेज हैं। लेकिन 10वीं अनुसूची, बागी गुट और चुनाव आयोग के नियमों ने इस 'मेगा मर्जर' को पेचीदा बना दिया है। जानिए विलय की राह में आने वाली 3 सबसे बड़ी कानूनी बाधाएं।

पश्चिम बंगाल की सियासत में इन दिनों एक अभूतपूर्व हलचल है। चर्चा है कि ममता बनर्जी अपनी पार्टी यानी तृणमूल कांग्रेस (TMC) का कांग्रेस में विलय कर सकती हैं। लेकिन यह राह उतनी आसान नहीं है जितनी दिखती है। पार्टी के अंदर उठ रहे बगावती सुरों ने इस पूरी प्रक्रिया को एक जटिल कानूनी और संवैधानिक पहेली में बदल दिया है। आइए इस पूरे घटनाक्रम को, इसके ऐतिहासिक और कानूनी पहलुओं के साथ विस्तार से समझते हैं।
ममता बनर्जी और TMC का इतिहास: 'हाथ' का साथ छोड़कर कैसे खिलाया 'जोड़ा फूल'?
ममता बनर्जी की राजनीतिक जड़ें कांग्रेस में ही रही हैं। 1970 और 80 के दशक में उन्होंने एक युवा और आक्रामक कांग्रेसी नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। लेकिन 90 के दशक के मध्य आते-आते, ममता को लगने लगा कि राज्य में वामपंथियों (CPI-M) को हराने के लिए कांग्रेस नेतृत्व पर्याप्त आक्रामकता नहीं दिखा रहा है। और फिर हुआ TMC का जन्म।
दिसंबर 1997 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से बगावत कर दी। उनका मानना था कि प्रदेश कांग्रेस वामपंथियों की 'बी-टीम' बन गई है। 1 जनवरी 1998 को उन्होंने आधिकारिक तौर पर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) की स्थापना की। चुनाव आयोग ने उन्हें 'जोड़ा घास फूल' (घास और दो फूल) का निशान दिया, जो बंगाल की माटी से जुड़ाव का प्रतीक बना।
लंबे संघर्ष के बाद, 2011 में ममता बनर्जी ने वामपंथियों के 34 साल पुराने किले को ढहा दिया और पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आईं। जिस पार्टी को ममता ने कांग्रेस की 'नरम' नीतियों के विरोध में बनाया था, आज 26 साल बाद उसी कांग्रेस में उसके विलय की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों का तापमान बढ़ा रही हैं।
10वीं अनुसूची: विलय के रास्ते का सबसे बड़ा 'रोड़ा'
संविधान की 10वीं अनुसूची, जिसे आम बोलचाल में दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है। यह किसी भी पार्टी के विलय में सबसे बड़ी कानूनी बाधा है। 1985 में राजीव गांधी सरकार द्वारा लाए गए इस कानून का मकसद 'आया राम, गया राम' की राजनीति को रोकना था।
क्या कहता है कानून?
अगर कोई विधायक या सांसद अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो सकती है। लेकिन, इसमें 'विलय' को लेकर एक खास छूट दी गई है।
क्या है 'जादुई आंकड़ा' (2/3 का नियम)?
कानून के पैराग्राफ 4 के मुताबिक, किसी पार्टी का दूसरी पार्टी में विलय तभी कानूनी रूप से मान्य होगा, जब मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (66.6%) विधायक और सांसद इस विलय के पक्ष में हों।
ममता बनर्जी के लिए इसका क्या मतलब है?
अगर ममता बनर्जी अपनी पार्टी को कांग्रेस में मिलाना चाहती हैं, तो उन्हें केवल खुद फैसला नहीं लेना है। पश्चिम बंगाल विधानसभा और संसद (लोकसभा+राज्यसभा) में TMC के जितने भी सदस्य हैं, उनमें से कम से कम 2/3 सदस्यों का हस्ताक्षर और स्पष्ट समर्थन उन्हें चाहिए होगा। अगर वह यह 'जादुई आंकड़ा' नहीं जुटा पाती हैं, तो विलय का समर्थन करने वाले सभी विधायकों और सांसदों की सदस्यता खतरे में पड़ जाएगी।
बागी गुट और चुनाव आयोग (ECI) का पेंच
मामला सिर्फ विधायकों की गिनती तक सीमित नहीं है। अगर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रीताब्रता बनर्जी जैसे बागी नेता यह दावा करते हैं कि 'असली TMC' उनका गुट है, तो यह लड़ाई सीधे चुनाव आयोग के दरवाजे पर पहुंचेगी।
सिंबल ऑर्डर, 1968 (Paragraph 15):
जब भी किसी पार्टी में दो फाड़ होते हैं और दोनों गुट असली होने का दावा करते हैं, तो चुनाव आयोग 'बहुमत परीक्षण' करता है। आयोग तीन चीजें देखता है:
- विधायी बहुमत: कितने विधायक/सांसद किसके साथ हैं?
- संगठनात्मक बहुमत: पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी, कार्यकारिणी सदस्य और ब्लॉक स्तर के नेता किसके साथ हैं?
- पार्टी का संविधान: पार्टी के अपने संविधान के नियमों का पालन हुआ है या नहीं?
पुराने उदाहरण से समझिए-
महाराष्ट्र में शिवसेना (एकनाथ शिंदे बनाम उद्धव ठाकरे) और NCP (अजित पवार बनाम शरद पवार) के मामलों में चुनाव आयोग ने विधायकों और संगठन के संख्या बल के आधार पर फैसला बागी गुटों के पक्ष में दिया था। अगर बंगाल में बागी गुट मजबूत हुआ, तो चुनाव आयोग TMC का नाम और 'जोड़ा फूल' चुनाव चिह्न सीज कर सकता है।
एक नजर में: विलय की राह में 3 बड़ी चुनौतियां
| चुनौती का क्षेत्र | मुख्य समस्या | संभावित नतीजा |
|---|---|---|
| संवैधानिक (कानूनी) | 2/3 विधायकों और सांसदों का स्पष्ट समर्थन जुटाना। | समर्थन न मिलने पर दल-बदल कानून के तहत विधायकों की सदस्यता जा सकती है। |
| चुनाव आयोग (ECI) | बागी गुट द्वारा 'असली TMC' होने का दावा ठोकना। | चुनाव आयोग पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न (सिंबल) जब्त कर सकता है। |
| संगठनात्मक (पार्टी कैडर) | जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को कांग्रेस के साथ काम करने के लिए मनाना। | बंगाल में लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन के खिलाफ लड़े कैडर में भारी असंतोष और बिखराव। |
असंतुष्ट गुट ही असली तृणमूल, कांग्रेस में विलय का सवाल नहीं : रीताब्रता बनर्जी
तृणमूल कांग्रेस के बागी नेता और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रीताब्रता बनर्जी ने बुधवार को दावा किया कि उनका गुट ही 'असली तृणमूल' है। उन्होंने इसी के साथ तृणमूल के कांग्रेस में विलय की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया। रीताब्रता का यह बयान पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी की कांग्रेस नेताओं के साथ मुलाकात और उनके नीत गुट के भविष्य को लेकर लगाई जा रही अटकलों के बीच आया है।
रीताब्रता ने दावा किया कि उनके नेतृत्व में बागी गुट के विधायकों की संख्या 58 से बढ़कर 64 हो गई है। उन्होंने कहा कि उनके नीत गुट को पार्टी के ज्यादातर विधायकों और बड़ी संख्या में सांसदों का समर्थन हासिल है और वे तृणमूल कांग्रेस के बैनर तले ही काम करते रहेंगे। रीताब्रता ने राज्य विधानसभा के बाहर संवाददाताओं से कहा, ''हम ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं। हम कांग्रेस में विलय नहीं कर रहे हैं।''
ममता मिलीं सोनिया से
ममता बनर्जी की कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात और राष्ट्रीय राजधानी में अभिषेक बनर्जी व कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बीच बातचीत की खबरों के बाद लगाई जा रही अटकलों के बीच उनकी ये टिप्पणियां आई है। इन मुलाकातों ने राजनीतिक हलकों में ममता नीत धड़े के भविष्य को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब पार्टी अपने 28 साल के इतिहास के सबसे बड़े अंदरूनी संकट से जूझ रही है। रीताब्रता ने हालांकि उन सुझावों को खारिज कर दिया कि संगठन कांग्रेस के नेतृत्व वाली किसी व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है। उन्होंने कहा, ''हमारे साथ विधायकों की संख्या पहले ही 64 के पार हो चुकी है। कल एक और विधायक के हमारे साथ जुड़ने पर यह संख्या 65 हो सकती है। जाहिर है, असली तृणमूल कांग्रेस हम ही हैं। दिल्ली में कौन किससे मिलता है, यह उनका मामला है और हमारे लिए इसका कोई महत्व नहीं है।''
एनडीए का समर्थन करेंगे
रीताब्रत ने सवाल किया, ''ज्यादातर विधायक कांग्रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं। ज्यादातर सांसद भी कांग्रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं। कई जिला नेता और स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि भी कांग्रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं। तो फिर विलय का सवाल ही कहां उठता है?'' उन्होंने दोहराया कि लोकसभा में बागी सांसद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग)का समर्थन जारी रखेंगे।
रीताब्रता का यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि तृणमूल के 20 बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में एक अलग संसदीय गुट बनाने की जानकारी दे दी है और राजग को समर्थन देने का संकल्प व्यक्त किया है। इस हफ्ते की शुरुआत में तृणमूल का संकट तब और गहरा गया, जब पश्चिम बंगाल विधानसभा में पार्टी के भीतर शुरू हुई बगावत संसद तक पहुंच गई।
(इनपुट एजेंसी)




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