तब तो धर्म ही टूट जाएगा, मंदिर-मस्जिद पर अर्जियों की आ जाएगी बाढ़; CJI की बेंच ने क्यों कहा ऐसा?
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर हर कोई संवैधानिक अदालत के सामने कुछ धार्मिक रीति-रिवाजों या धर्म से जुड़े मामलों पर सवाल उठाना शुरू कर देगा, तो उस सभ्यता का क्या होगा, जहाँ धर्म भारतीय समाज से इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है?

सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार (7 मई) को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर लोग धार्मिक प्रथाओं या धर्म से जुड़े मामलों पर संवैधानिक अदालत में सवाल उठाने लगेंगे तो विभिन्न रीति-रिवाजों और परंपराओं पर सवाल उठाने वाली सैकड़ों याचिकाएं दायर होंगी जिससे धर्मों और सभ्यता के विघटन का खतरा पैदा हो जाएगा। इसलिए, ऐसे मामलों से निपटते समय अदालतों को बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच, जिसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल हैं, ने कहा कि अगर अदालत किसी एक ऐसे मामले में दखल देती है, तो इससे धर्म से जुड़े ऐसे कई और मामले या चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
अदालत ने यह टिप्पणी सबरीमाला रेफरेंस केस की सुनवाई के दौरान की। इस मामले में धर्म से जुड़े कई बड़े कानूनी सवाल और धार्मिक मामलों में दखल देने की अदालतों की शक्ति पर विचार किया जा रहा है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “अगर हर कोई संवैधानिक अदालत के सामने कुछ धार्मिक रीति-रिवाजों या धर्म से जुड़े मामलों पर सवाल उठाना शुरू कर देगा, तो उस सभ्यता का क्या होगा, जहाँ धर्म भारतीय समाज से इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है? तब सैकड़ों याचिकाएँ दायर होंगी, जिनमें इस अधिकार या उस अधिकार पर सवाल उठाए जाएँगे; मंदिर या मस्जिद खोलने या बंद करने जैसे मुद्दे उठाए जाएँगे... हम इस बात को लेकर बहुत-बहुत सचेत हैं।”
9 जजों की संविधान पीठ के सामने आया मामला
दरअसल, नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ महिलाओं के साथ धार्मिक स्थलों पर होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रही है। इनमें केरल के सबरीमला मंदिर से जुड़ा मामला भी शामिल है। साथ ही, यह पीठ दाऊदी बोहरा समुदाय सहित विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार कर रही है। दाऊदी बोहरा समुदाय के केंद्रीय बोर्ड ने 1986 में एक जनहित याचिका दायर कर 1962 के उस फैसले को रद्द करने की मांग की थी जिसने बॉम्बे बहिष्कार निवारण अधिनियम, 1949 को निरस्त कर दिया था - इस कानून के तहत समुदाय के किसी भी सदस्य का बहिष्कार करना अवैध था।
दाऊदी बोहरा समुदाय का क्या मामला?
संविधान पीठ के 1962 के फैसले में कहा गया था, "दाऊदी बोहरा समुदाय की धार्मिक आस्था और सिद्धांतों से यह स्पष्ट है कि धार्मिक आधार पर इसके धार्मिक प्रमुख द्वारा बहिष्कार की शक्ति का प्रयोग धर्म संबंधी मामलों में इसके कामकाज के प्रबंधन का हिस्सा था और 1949 के अधिनियम ने ऐसे बहिष्कार को भी अमान्य घोषित करके संविधान के अनुच्छेद 26(ख) के तहत समुदाय के अधिकार का उल्लंघन किया।" सुधारवादी दाऊदी बोहरा समुदाय के एक समूह की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि किसी व्यक्ति के धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक आचरण के जवाब में अपनाई जाने वाली किसी प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता। इसलिए उसे संविधान के अनुच्छेद 26 के अंतर्गत 'धर्म से संबंधित मामला' भी नहीं माना जा सकता।
इस सभ्यता का क्या होगा?
अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अदालत से कहा कि कोई प्रथा भले ही धार्मिक पहलू रखती हो, लेकिन यदि उसका मौलिक अधिकारों पर गंभीर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 या अनुच्छेद 26 के तहत प्रतिबंधों से पूरी तरह छूट नहीं दी जा सकती। इस दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यदि हर कोई कुछ धार्मिक प्रथाओं या धर्म से जुड़े मामलों को संवैधानिक अदालत में चुनौती देने लगे तो ''इस सभ्यता का क्या होगा, जहां धर्म भारतीय समाज से इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है।''
सुनवाई के दौरान जस्टिस सुंदरेश ने कहा, ''हर धर्म विघटित हो जाएगा और हर संवैधानिक अदालत को बंद करना पड़ेगा।'' उन्होंने कहा, '' यदि दो पक्षों के बीच विवादों को अनुमति दी जाती है, तो हर कोई हर चीज़ पर सवाल उठाने लगेगा...।'' इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि भारत को अन्य क्षेत्रों से अलग करने वाली बात यह है कि इतनी विविधताओं और बहुलताओं के बावजूद "हम एक सभ्यता हैं"।




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