शुभेंदु अधिकारी से लेकर हिमंत तक, भाजपा ने दूसरी पार्टी से आए किसे-किसे बनाया सीएम; देखें लिस्ट
बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के CM बनने के साथ ही BJP का नया 'विनिंग फॉर्मूला' चर्चा में है। जानिए हिमंत शर्मा और सम्राट चौधरी सहित उन 6 BJP मुख्यमंत्रियों के बारे में जिन्होंने दूसरे दलों से आकर पार्टी में सत्ता के शिखर तक का सफर तय किया।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सियासत का अंदाज अब पूरी तरह बदल चुका है। कभी अपने कैडर और दशकों से पार्टी का झंडा उठाने वाले पुराने नेताओं को ही मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने वाली भाजपा अब 'विनिंग फॉर्मूले' पर अधिक भरोसा कर रही है। जिन राज्यों में पार्टी का संगठन ऐतिहासिक रूप से कमजोर रहा है, वहां दूसरे दलों से आए मजबूत और कद्दावर नेताओं पर दांव लगाने से पार्टी को अब कोई परहेज नहीं है। पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना इसी रणनीति का सबसे ताजा और बड़ा उदाहरण है। दिलचस्प बात यह है कि शुभेंदु अधिकारी भाजपा के उस खास 'क्लब' के सबसे नए सदस्य बन गए हैं, जिसमें दूसरे दलों से आकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले कई नेता पहले से ही शामिल हैं। आइए जानते हैं भाजपा के उन मुख्यमंत्रियों के बारे में, जिन्होंने अपना राजनीतिक सफर तो किसी और दल से शुरू किया लेकिन आज वे भाजपा के सबसे बड़े चेहरों में गिने जाते हैं।
शुभेंदु अधिकारी: 'दीदी' के करीबी से बंगाल के 'किंग' तक
पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार बनाने वाली भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के लिए शुभेंदु अधिकारी को चुना है। महज छह साल पहले (2020 में) भाजपा में शामिल हुए शुभेंदु का सफर बेहद दिलचस्प रहा है।
ममता के रहे हैं बेहद खास: शुभेंदु कभी तृणमूल कांग्रेस (TMC) में ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते थे। 2007 में नंदीग्राम के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन में उनकी अहम भूमिका थी, जिसने 2011 में ममता को सत्ता के शिखर पर पहुंचाया था।
दो बार दी ममता को मात: 2020 में टीएमसी में खुद को दरकिनार किए जाने के बाद उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। इसके बाद उन्होंने 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम और अब 2026 में भवानीपुर से सीधे मुकाबले में ममता बनर्जी को दो बार हराया है।
संगठन से ऊपर नेता को तरजीह: बंगाल में भाजपा ने 2011 में एक भी सीट नहीं जीती थी, लेकिन हालिया चुनावों में उसने 293 में से 207 सीटों पर प्रचंड जीत दर्ज की है। जमीनी स्तर पर संगठन पूरी तरह तैयार होने से पहले ही आए इस बड़े चुनावी उछाल के कारण पार्टी ने अनुभवी संगठनकर्ताओं के बजाय एक स्थापित जनाधार वाले नेता (शुभेंदु) को सीएम बनाना मुनासिब समझा।
हिमंत विश्व शर्मा: असम में कांग्रेस के दिग्गज, अब भाजपा के फायरब्रांड सीएम
शुभेंदु अधिकारी से पहले यह ट्रेंड असम में देखने को मिला था, जहां वर्तमान मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने कांग्रेस से भाजपा तक का सफर तय किया।
कांग्रेस छोड़ने की कहानी: 2014 तक असम में कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे हिमंत ने तत्कालीन सीएम तरुण गोगोई से मतभेदों के चलते 2015 में पार्टी छोड़ दी थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तब राहुल गांधी से मुलाकात के दौरान राहुल उनकी बात सुनने के बजाय कथित तौर पर 'एक कुत्ते को बिस्किट खिलाने' में व्यस्त थे, जिससे नाराज होकर उन्होंने अलग राह पकड़ ली।
भाजपा को दिलाई सत्ता: 2016 में असम में पहली बार भाजपा की सरकार बनाने में शर्मा की अहम भूमिका रही। पार्टी ने पहले सर्वानंद सोनोवाल को सीएम बनाया, लेकिन 2021 की लगातार दूसरी जीत के बाद सोनोवाल को केंद्र में मंत्री बनाकर हिमंत विश्व शर्मा को असम का मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया।
पूर्वोत्तर के तीन और राज्य: जहां 'दलबदलुओं' पर ही टिका है भाजपा का राज
असम के अलावा पूर्वोत्तर के तीन अन्य राज्यों में भी भाजपा ने दूसरे दलों से आए नेताओं को ही सत्ता की कमान सौंपी है।
पेमा खांडू (अरुणाचल प्रदेश): 2016 में तत्कालीन कांग्रेसी सीएम पेमा खांडू 43 विधायकों के साथ पीपीए (PPA) में चले गए। दो महीने बाद उन्होंने पीपीए भी तोड़ दी और 32 विधायकों के साथ भाजपा में आ गए। इसके साथ ही अरुणाचल जैसे राज्य में कमजोर रही भाजपा अचानक एक मजबूत ताकत बन गई और खांडू सीएम की कुर्सी पर बने रहे।
एन. बीरेन सिंह (मणिपुर): कभी कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे बीरेन सिंह 2016 में भाजपा में शामिल हुए। 2017 में जब भाजपा ने मणिपुर में अपनी सरकार बनाई, तो उन्हें ही मुख्यमंत्री पद का ताज पहनाया गया।
माणिक साहा (त्रिपुरा): कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले माणिक साहा 2016 में भाजपा में आए। 2020 से 2022 तक वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे। 25 साल के वामपंथी शासन को 2018 में उखाड़ फेंकने वाली भाजपा ने 2022 में बिप्लब कुमार देब को हटाकर साहा को मुख्यमंत्री बना दिया।
सम्राट चौधरी: बिहार में पार्टी के पुराने नियमों का अपवाद
अक्सर अपने गढ़ वाले राज्यों में भाजपा किसी पुराने और वफादार नेता को ही सीएम बनाती है, लेकिन बिहार इस नियम का अपवाद बन गया है। बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के पहले मुख्यमंत्री बने सम्राट चौधरी 2017 में ही पार्टी में शामिल हुए थे। इससे पहले वे आरजेडी (RJD) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) में लंबा समय बिता चुके हैं।
क्यों खेला यह दांव?: बिहार में भाजपा को पारंपरिक रूप से सवर्णों की पार्टी माना जाता रहा है। लालू यादव की आरजेडी के पास यादवों का और नीतीश कुमार की जेडीयू के पास कुर्मी समाज का वोट बैंक है। इसके मुकाबले कुशवाहा/कोइरी समाज से आने वाले सम्राट चौधरी भाजपा के लिए बेहद अहम हैं।
सुशील कुमार मोदी के निधन के बाद बिहार में भाजपा के पास कोई कद्दावर ओबीसी चेहरा नहीं था। 'लव-कुश' (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण और ओबीसी मतदाताओं को साधने के लिए ही पार्टी ने एक नए चेहरे को सूबे की सबसे बड़ी कुर्सी सौंपने का यह ऐतिहासिक फैसला लिया।




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